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*सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा ।*
*दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ लै का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भूप कहा फिर क्यों कर आवन,*
*ढील भई घर संत पधारे ।*
*मैं अब आवत भूप लग्यो पग,*
*आप कृपा मम राम सिधारे ॥*
*शिष्य भयो उर भाव लियो अरु,*
*प्रेम छयो सब पित्र उधारे ।*
*रीति वही आज हूँ सुत नातिन,*
*और कुटुम्ब कर्यो निरधारे ॥१६८॥*
राजा ने कहा - पुनः लौटकर क्यों आया है ? सेन जी ने कहा - कृपा करके घर पर संत पधार गये थे । उनकी सेवा में लग जाने से देर हो गई है । इसके लिये आप क्षमा करें । राजा ने कहा - तुम क्या कह रहे हो ? अभी तो मेरी संपूर्ण सेवा अन्य दिन से भी बहुत अच्छी करके गये हो ।
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सेन ने कहा - मैं तो अभी आया हूँ । यह सुनकर राजा समझ गया कि - मेरी सेवा करने वाले साक्षात् भगवान् ही थे, तभी तो मेरी सभी व्यथा नष्ट हो गई है । इन सेन जी की कृपा से भगवान् का स्पर्श और दर्शन प्राप्त हुआ है इससे ये मेरे गुरु ही हैं । हृदय में ऐसा भाव करके राजा सेन जी के चरणों में पड़ गये और बोले - आपकी कृपा से मेरे यहां रामजी का पधारना हुआ है, मैं धन्य हूं ।
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फिर राजा सेनजी का शिष्य हो गया । सेवक भाव हटाकर अपने हृदय में सेन जी के प्रति गुरु भाव धारण कर लिया । राजा के हृदय में भगवत् प्रेम छा गया। वह बोला - आज मेरे सर्व पित्रों का आपने उद्धार कर दिया है ।
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सेन जी के पुत्र पौत्रादि की रीति भी वही रही अर्थात् संत सेवा करते रहे और उनके कुटुम्ब ने भी यही निर्णय किया था कि सन्त सेवा से ही कल्याण होता है, हमें सन्त सेवा सदा करते रहना चाहिये ।
(क्रमशः)

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