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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १८५/१८८*
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जहां साध तहां रांमजी, जहां रांम तहां साध ।
कहि जगजीवन जुगल६ जस, यहु गति अगम अगाध ॥१८५॥
(६. जुगल जस=दोहरा सम्मान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ साधुजन है वहां ही प्रभु है और जहाँ प्रभु है वहां साधु है । संत कहते हैं कि इन दोनों की महिमा कही नहीं जा सकती है ।
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पांच पच्चीस अरु तीन गुण, सकल सांतरौ७ साध ।
जगजीवन अम्रित पिवै, नहीं आंन सौं हाथ ॥१८६॥
(७. सांतरौ=पृथक् कर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच ज्ञानेन्द्रियों व उनकी पच्चीस प्रकृति व तीन सत्व रज, व तम गुण, इन सबको संत पृथक करते हैं । वे इस प्रकार प्रभु नाम अमृत का पान करते हैं । किसी से कोइ आशा नहीं रखते ।
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उनमनि मन अस्थिर करै, रांम नांम गुन गाइ ।
जगजीवन पट भीतरै, हरि निहचै८ परसै ताइ ॥१८७॥
{८. निहचै=निश्चय(अवश्यही)}
संतजगजीवन कहते हैं कि स्थिर मन को अस्थिर नहीं होने देते संत जन राम गुण गाते रहते हैं । तभी उनके ह्रदय में प्रभु निश्चय ही उन्हें अपना सानिध्य देते हैं ।
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छाया९ रमिये रांम की, हरि सुमिरण की वोट१० ।
तिन की संगति जिन करै, जगजीवन जहँ खोट११ ॥१८८॥
(९. छाया=अधीनता) {१०. वोट=ओट(शरणस्थल)} {११. खोट=कमी(दुर्गुण)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम रजा में रहते हैं । और प्रभु की शरण ही जिनका निवास है । ऐसे लोगों की जो संगति नहीं करते उनमें अवश्य कोइ खोट है या दुर्गुण है ।
(क्रमशः)

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