रविवार, 19 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.११०

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११०)*
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*११०. निस्पृहता । प्रतिताल*
*तो काहे की परवाह हमारे, राते माते नाम तुम्हारे ॥टेक॥*
*झिलमिल झिलमिल तेज तुम्हारा, परगट खेलै प्राण हमारा ॥१॥*
*नूर तुम्हारा नैनों मांही, तन मन लागा छूटै नांही ॥२॥*
*सुख का सागर वार न पारा, अमी महारस पीवनहारा ॥३॥*
*प्रेम मगन मतवाला माता, रंग तुम्हारे दादू राता ॥४॥*
*इति राग कान्हड़ा समाप्त ॥४॥पद १३॥*
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भा० दी०–यस्य नामैव जगबन्धविपिनदावाग्निकल्यं परहितनिरतात्मनां महात्मनां सर्वदा सुसेव्यं तस्यैव नामचिन्तनेनाहं निरपेक्षो निरीहोऽस्मि । अतो न किमपि वस्तु वाञ्छामि सर्वत उदासीनत्वात् । तर्हि जगति किं प्रयोजन मे । भवत्स्वरूपप्रकाश: सर्वासु दिक्षु प्रकाशते । तस्मिन्नेव स्वरूपप्रकाशे ममात्माऽपि दर्शनानन्दक्रीडामनुभवन् रमते । भवतां स्वरूपं मम दृग्गोचरोविलसतितरां प्रतिक्षणम् । अस्मच्छरीरं मन्च तस्मिन्नेवस्वरूपानन्दे निमग्नं सत्कदापि पृथक् भवितुं नेच्छति । भवांश्चापार: सुखसागरोऽस्ति । अहन्तु स्वरूपामृतरसं पायं पायं तव प्रेमपरिप्लुत उन्मत्तवद् भवदनुरागरञ्जितोऽस्मि । नाहं मायिकं सासारिकं सुखं समीहे । आकाङ्क्षाविरहात् । नहि भक्तानां चित्ते विषयलोभो भवति ।
उक्तं च श्रीमद्भागवते-
न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनाऽन्यत् ।
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जिसका नाम संसार रूपी वन को जलाने के लिये दावाग्नि की तरह है और परोपकारी महात्मा जिसका जप करते रहते हैं । उसी नाम के चिन्तन से मैं निरीह तथा निरपेक्ष होने से किसी भी पदार्थ की कामना नहीं करता क्योंकि मैं संसार से सर्वथा उदासीन हो गया ।
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हे परमात्मन् ! आपके स्वरूप का प्रकाश चारों दिशाओं में चमचमा रहा है । आपका स्वरूप मेरे नेत्रों में सदा विराज रहा है । मेरा शरीर, मन उसी स्वरूपानन्द में विलिन हो गया, अब कभी भी अलग नहीं होऊँगा ।
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आप तो अपार सुख के सागर हैं । मैं तो आपके स्वरुपामृतरूपी महारस का पान करके आपके प्रेम रूपी रंग में रंग गया हूं । अब मैं कभी भी मायिक पदार्थों की इच्छा नहीं करता, क्योंकि मैं उन सब से उदासीन हूं ।
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भागवत में लिखा है कि –
मेरे में जिसका मन लगा हुआ है, ऐसा भक्त न तो ब्रह्म लोक को चाहता, न इन्द्र लोक व स्वर्ग को चाहता है, न पाताल का साम्राज्य और न पृथिवी को चाहता है, वह तो केवल मेरे को ही चाहता है ।
(क्रमशः)

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