रविवार, 19 सितंबर 2021

*अनन्तानन्दजी के शिष्य अल्हजी*

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*धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश ।*
*दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अनन्तानन्दजी के शिष्य अल्हजी*
*धनि अविगत अचरज कियो, आम नवायो अल्ह कौं ॥*
*उपवन उत्तम स्थान, फूल फल ता मधि भारी ।*
*तहँ महन्त भयो मगन, समझ सेवा विस्तारी ॥*
*भवितव्यता के भाव, असुर अजगैबी आये ।*
*(उन) लीन्ही छांह छुडाय, संत मुनि मारि उठाये ॥*
*राघव राम हिं रिस भई, शठ समझाये कल्ह कौं ।*
*धनि अविगत अचरज कियो, आम नवायो अल्ह कौं ॥१७५॥*
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मन इन्द्रियों के विषय परमात्मा को धन्य है कि जिनने संत अल्ह के लिये आम वृक्ष को नीचे झुकाकर आश्चर्य कर दिया था । सो ही कह रहे हैं – अनन्तानन्दजी के शिष्य संत अल्हजी किसी तीर्थ की यात्रा करने जा रहे थे । मार्ग में किसी राजा का एक सुन्दर बाग रूप उत्तम स्थान आया । उसमें फूल फल अति मात्रा में थे । उस को देखकर महान् संत अल्हजी अति प्रसन्न हुये और उस स्थान को भगवद् सेवा पूजा के योग्य समझकर, वहां ही सेवा-पूजा करने की साधन सामग्री फैलादी ।
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थोड़ी देर में होनहार के कारण अकस्मात् ही वहां कोई मुसलमान आ गये । जहां अल्हजी सेवा पूजा की तैयारी करके बैठे थे, वहां की छाया तथा स्थान सुन्दर था । उन्होंने अल्ह जी को कहा - तुम यहां से हट जाओ । अल्हजी ने संकेत किया, मैं सेवा-पूजा करूंगा, तुम ही दूसरे स्थान पर चले जाओ । इस पर उन्होंने उस मुनि संत को बल से धक्के मार के उठा दिया । छाया छुड़ाली ।
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ऐसा करने से उन पर भगवान् ने कोप किया और उन शठों में परस्पर कलह कराकर उनको समझा दिया अर्थात् वे परस्पर पिटकर वहां से चले गये । इधर अल्हजी की सेवा-पूजा समाप्त हो गई तब उन्होंने भगवान् के भोग लगाने के लिये माली से आम माँगा । माली ने कहा - भगवान् को खाना होगा तो भगवान् ही तोड़ लेंगे । तुम काहे को माँगते हो ? तब पके हुये आमों की शाखा अपने आप ही झुक कर भगवान् के पास आ गई ।
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संत अल्ह जी ने इच्छानुसार आम्र फल तोड़कर भगवान् के भोग लगाया । यह आश्चर्य देखकर माली दौड़ता हुआ राजा के पास गया और उक्त आम के नीचे झुकने की बात सुनाई । राजा अति शीघ्र बाग में आकर संत अल्ह के चरणों में पड़के प्रेम में निमग्न हो गया । अल्हजी ने उसे भगवत् प्रसाद देकर भगवद् भक्ति का माहात्म्य समझाया और शिष्य बनाकर कृतार्थ किया । जहां ब्रह्मादिक भी शीश नमाते हैं, वहां वृक्ष का झुकना कौनसी बड़ी बात है ।
(क्रमशः)

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