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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ ।*
*दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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ह्वै फकीर अरु माँगै नांहीं, गृही रहित रहै गृह मांहीं ।
तिन समान नांहीं संसारा, मन वच कर्म सु कीन्ह विचारा ॥२५॥
फकीर तो है किन्तु याचना नहीं करते, गृही रहित हैं अर्थात संतान उत्पन्न नहीं करते और घर में रहते हैं हमने मन, वचन, कर्म से विचार किया है, उसके समान संसार में कोई भी नहीं है ।
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रज्जब काँटा चाह का, विष रूपी सु विषैल१ ।
सो व२ चुभ्या चित चरण में, रही३ सु गोविंद४ गैल५ ॥२६॥
जैसे कोई जहरीला१ काँटा चरण में चुभ जाता है तब मार्ग चलना छूट जाता है । वैसे ही आशा का कांटा भी विषरूप है, सो वह२ चित्त में चुभ जाता है अर्थात सांसारिक आशा मन में आ जाती है तब प्रभु४ प्राप्ति का साधन-मार्ग५ छूट३ जाता है ।
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बंदा१ गंदा होत है, जब माँगै कछु और ।
चरण छुड़ाया चाह ने, किया आपना२ चोर ॥२७॥
जब भगवत् साक्षात्कार से भिन्न कुछ और मांगता है तब दास१ गंदा हो जाता है । इस आशा ने ही भगवान के चरण कमल छुड़ाये हैं और निज२ स्वरूप प्रभु का ही चोर बना दिया है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सकाम निष्काम का अंग १५९ समाप्तः ॥सा. ५०२२॥
(क्रमशः)

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