🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये ।*
*चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १८३)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
श्रीरामकृष्ण - मेरी अवस्था बदल गयी है । अब आदमियों के साथ वादविवाद नहीं कर सकता । इस समय मेरी ऐसी अवस्था नहीं है कि हाजरा के साथ तर्क और झगड़ा कर सकूँ । यदु मल्लिक के बगीचे में हृदय ने कहा, 'मामा, क्या मुझे रखने की तुम्हारी इच्छा नहीं है ?' मैंने कहा, 'नहीं, अब मेरी वैसी अवस्था नहीं है कि तेरे साथ गला फाड़ता रहूँ ।'
.
"ज्ञान और अज्ञान किसे कहते हैं ? जब तक यह बोध है कि ईश्वर दूर है तब तक अज्ञान है और जब यह बोध है कि ईश्वर यहीं तथा सर्वत्र है, तभी ज्ञान है ।
"जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब सब चीजें चेतन जान पड़ती हैं । मैं शिबू के साथ खूब मिलता-जुलता था । तब शिबू निरा बच्चा था । चार-पाँच साल का रहा होगा । उस समय में देश में था, बादल घिरे हुए थे और मेघों की गर्जना हो रही थी । शिबू मुझसे कहता था, चाचा, देखो, चकमक पत्थर घिस रहा है । (सब हँसते हैं ।)
.
एक दिन देखा, वह अकेला पतिंगे पकड़ने जा रहा था । इधर-उधर के पौधे हिल रहे थे । तब वह पत्तियों से कह रहा था, चुप-चुप, मैं पतिंगे पकडूंगा । बालक सब चेतन देख रहा है । सरल विश्वास, बालक की तरह का विश्वास जब तक नहीं होता, तब तक ईश्वर नहीं मिलते । उफ ! मेरी कैसी अवस्था थी । एक दिन घास के वन में किसी कीड़े ने काट लिया । मुझे इससे बड़ा भय हुआ । सोचा कहीं साँप ने न काटा हो । तब क्या करता ?
.
मैंने सुना था, अगर वह फिर काटे तो विष उठा लेता है । बस वहीं बैठा हुआ मैं बिल खोजने लगा कि वह फिर काटे । इसी तरह बैठा था कि एक ने पूछा, यह आप क्या कर रहे हैं ? मैंने कहा, बिल खोज रहा हूँ । उसने सब कुछ सुनकर कहा, ठीक वहीं पर उसे दुबारा काटना चाहिए, तब कहीं विष उत्तरता है । तब मैं उठकर चला आया । शायद गोजर या किसी कीड़े ने काटा था ।
.
"एक दूसरे दिन मैंने रामलाल से सुना, शरद् काल की ओस देह में लगाना अच्छा होता है । क्या एक श्लोक है, रामलाल ने कहा था । कलकत्ते से जाते समय गाड़ी की खिड़की से मैं गला बढ़ाये हुए गया, ताकि खूब ओस लगे । बस दूसरे ही दिन बीमार पड़ गया ।" (सब हँसते हैं ।)
.
अब श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर जाकर बैठे । उनके पैर कुछ फुले हुए थे । उन्होंने भक्तों को हाथ लगाकर देखने के लिए कहा कि दोनों उँगली से दबाने पर गड्डा पड़ता है या नहीं । थोड़ा-थोड़ा गड्डा पड़ने लगा । परन्तु लोगों ने कहा, यह कुछ नहीं है ।
.
श्रीरामकृष्ण - (भवनाथ से) - सींती के महेन्द्र को बुला देना । उसके कहने से मेरा मन अच्छा हो जायगा ।
भवनाथ - (सहास्य)- आप दवा पर बड़ा विश्वास करते हैं, हम लोग उतना नहीं करते ।
श्रीरामकृष्ण - दवाएँ भी उन्हीं की है । एक रूप से वे ही चिकित्सक हैं । गंगाप्रसाद ने बतलाया, आप रात को पानी न पिया कीजिये । मैं उसकी बात को वेदवाक्य की तरह पकड़े हुए हूँ । मैं मानता हूँ, वह साक्षात् धन्वन्तरि है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें