मंगलवार, 7 सितंबर 2021

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*दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव ।*
*अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक का कष्ट हरि दूर करते हैं ॥*
पद सेवक के कष्ट का करते हरि झट नास ।
दिया प्रेमनिधि के लिये बादशाह को त्रास ॥१२४॥
दृष्टांत कथा – प्रेमनिधि जी आगरा के ब्राह्मण थे । प्रायः भगवत् सेवा में ही लगे रहते थे । सेवा से छुट्टी मिलने पर भगवचरित्रों की कथा भी करते थे । दुष्टों ने बादशाह से कहा – 'प्रेमनिधि कथा के बहाने नगर की स्त्रियों को अपने यहां बुलवाता है, यह अनर्थ है ।'
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बादशाह ने उन्हें बुलवाने को भेजा । वे भगवत् सेवा के लिये जल लाने जारहे थे किन्तु सिपाही के आग्रह से बादशाह के पास जाना पड़ा । और बादशाह के पूछने पर कहा – 'कथा में किसी को भी रोक नहीं होती किन्तु स्त्रियों को पाप द्ष्टि से देखना ही पाप है । बादशाह – 'तुम्हारे लोगों ने ही खोटी २ बातें कही है, इसलिये इसका निर्णय कराना है ।' यह कहकर प्रेमनिधि को नजर बन्द कर दिया ।
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रात्रि को स्वप्न में बादशाह के इष्ट देव ने बादशाह से कहा – 'हमें प्यास लगी है ।' बादशाह –'जल के गढ़े भरे हैं पीजिये ।' इस्टदेव – 'तेरे घड़े का जल कौन पियेगा ।' यह कहते हुये बादशाह के एक लात मार करके बोले – 'मेरी बात सुन । बादशाह – 'जो आज्ञा ।'
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इष्ट देव – 'हमें जो पानी पिलाने वाला है उसे तूने कैद कर दिया है । अब हमें पानी कौन पिलावे ।' यह सुनते ही बादशाह की आँखे खुल गयी और उसी समय प्रेमनिधि जी से क्षमा माँगकर उन्हें उनके स्थान पर पहुंचा दिया । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त का कष्ट भगवान् शीघ्र ही दूर करते हैं ।

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