मंगलवार, 21 सितंबर 2021

*श्री रंगजी की पद्य टीका*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*राम नाम रुचि उपजै, लेवे हित चित लाइ ।*
*दादू सोई जीयरा, काहे जमपुरि जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*श्री रंगजी की पद्य टीका*
*श्रीरंग नाम सरावग जान,*
*हुतो दिवसा तिन बात बखानौं ।*
*चाकर हो यम-धाम गयो उत,*
*दूत भयो इन आय लखानौं ।*
*नायक नैं लिये जात सु देख हु,*
*सींग बढ्यो पशु मार दिखानौं ।*
*राम भजे बिन हो जग यूं गति,*
*भक्त भयो शिर अनन्त रखानौं ॥१७०॥*
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राजस्थान के दौसा ग्राम के एक सरावगी वैश्य कुल में श्रीरंग जी का जन्म हुआ था । उनके भगवत् भक्त होने की कथा कहते हैं -
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श्रीरंग के घर में एक नौकर रहता था, वह मर कर यमलोक में गया और वहां यमदूत बन गया । यमराज की आज्ञा से दौसा ग्राम में एक बनजारे को लेने आया था । पहले परिचित होने से श्रीरंग के सामने प्रकट होकर बोला - सेठजी ! मेरी ओर देखो और सुनो, मैं यमदूत बन गया हूँ और यहां जो बनजारे आये हुए हैं, उनमें से एक को लेने आया हूँ । तुम भी यह खेल देखो । उसी के बैल के सींग पर बैठ कर मैं उसे अभी मार डालता हूँ ।
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तुम भी समझ लेना कि राम की भक्ति बिना सभी की इस प्रकार ही मृत्यु होती है । इस घटना को प्रत्यक्ष देख के, यदि तुम अपनी रक्षा चाहो तो स्वामी अनन्तानन्द जी की शरण हो जाना । श्रीरंग यमदूत के बताये हुए स्थान पर गये और देखा कि बनजारे के बैल पशु का सींग बनजारे की ओर बढ़ा और उसके पेट को चीर डाला ।
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तब श्रीरंग को यह निश्चय हो गया कि राम के भजन बिना इस प्रकार की ही गति होती है । इससे वह अनन्तानन्द जी को शिर पर गुरु धारण करके भगवान् का भक्त बन गया ।
(क्रमशः)

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