मंगलवार, 21 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १९३/१९६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १९३/१९६*
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चहिन१ करै चेतै नहीं, वो घर अगम अगाध ।
सुधि बुधी२ हरि सुमिरण करै, जगजीवन ते साध ॥१९३॥
(१. चहिन करै= सकाम भावना से साधना करे) (२. सुधि बुधि=सोच समझ कर)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो सकाम भावना से भक्ति करें और कामना सिर्फ प्रभु प्राप्ति की ही हो तो वह अगम अगाध प्रभु का निवास ही है जो पूर्ण समर्पण भाव से भक्ति करें वे सच्चे साधु हैं ।
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जगजीवन संतोष सत, जिनके मांहै सांच ।
सो तो कंचन होइ रहै, आंन सकल एक काच ॥१९४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिन जीवों में ईश्वरीय शक्ति, संतोष, व सत्य है वे तो कचंन के समान दोष रहित हैं बाकि सब तो कांच के मूल्यहीन टुकड़ों जैसे हैं ।
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भाव निरंतर का ह्रिदै, सेवा सुमिरण ध्यांन ।
जगजीवन मनसा मगन, प्रेम पिवै तजि आंन ॥१९५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनके हृदय में प्रभु का ध्यान हो व सेवा स्मरण का निश्चय हो जो अपने मन के इसी भाव में मग्न रहते हों वे अन्य सब कुछ छोड़ कर प्रभु प्रेम रुपी आनंद का पान ही करते हैं ।
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भाव निरंतर का ह्रिदै, अंदरि एक विचारि ।
जगजीवन हरि नाउँ निज, सुमिरण एही सारि ॥१९६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनके हृदय में एक ही विचार हो कि हरि स्मरण करना है । यह ही स्मरण का सार है । वे अन्यत्र ध्यान देते ही नहीं है ।
(क्रमशः)

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