सोमवार, 20 सितंबर 2021

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*जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।*
*उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ प्रभु पूजक से इन्द्रादिक भी हार मानते हैं ॥*
प्रभु पूजक से मानते, इन्द्रादिक भी हार ।
यज्ञ अश्व पृथु का दिया, मधवा ने कर प्यार ॥१४७॥
दृष्टांत कथा – महाराज पृथु भगवान् के अर्चना भक्त थे । जब उनका सौवां अश्वमेध हो रहा था तब इन्द्र ने उनका घोड़ा चुराया था । राजा के पुत्र ने घोड़ा छुडा लिया किन्तु फिर भी इन्द्र ने भेष बदल कर कई वार घोड़ा चुराया । अन्त में महाराज पृथु ने इन्द्र पर कोप करके जब इन्द्र के संहार के लिए बाण चढ़ाया ।
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तब तुरंत ब्रह्माजी राजा के पास आये और उन्हें समझाया कि – सौ अश्वमेध पूरे होने से इन्द्र अपने पद से गिर जाते हैं और सौ अश्वमेध करने करने वाला इन्द्र बनता है । आप तो भगवत् भक्त हैं, आपको इन्द्र पद की इच्छा भी नहीं फिर आप इस यज्ञ के पूर्ण करने के आग्रह को छोड दीजिये । राजा ने ब्रह्माजी की बात मान ली और यज्ञ बन्द कर दिया । इससे यह ज्ञात होता है कि प्रभु पूजक से इन्द्रादिक भी हार मान लेते हैं ।

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