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*दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ ।*
*सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ज्ञानी तथा भक्त की अवस्था*
"इस अवस्था में सब समय सब तरह का भोजन नहीं खाया जाता ।”
नरेन्द्र - खाने-पीने के लिए जो कुछ मिला, वही बिना विचार के खाना अच्छा है ।
श्रीरामकृष्ण - यह बात एक विशेष अवस्था के लिए है । ज्ञानी के लिए किसी में दोष नहीं । गीता के मत से ज्ञानी खुद नहीं खाता, वह कुण्डलिनी को आहुति देता है ।
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"यह बात भक्त के लिए नहीं है । मेरी इस समय की अवस्था यह है कि ब्राह्मण का लगाया भोग न हो तो मैं नहीं खा सकता । पहले ऐसी अवस्था थी कि दक्षिणेश्वर के उस पार से मुर्दों के जलने की जो बू आती थी, उसे मैं नाक से खींच लेता था - वह बड़ी मीठी लगती थी । पर अब सब के हाथ का नहीं खा सकता ।
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"और सचमुच नहीं खा सकता, यद्यपि कभी कभी खा भी लेता हूँ । केशव सेन के यहाँ मुझे नववृन्दावन नाटक दिखाने ले गये थे । पूड़ियाँ और पकौड़ियाँ ले आये । न मालूम धोबी ले आया था या नाई । (सब हँसते हैं ।) मैंने खूब खाया । राखाल ने कहा, जरा और खाओ ।
(नरेन्द्र से) “तुम्हारे लिए इस समय यह चल सकता है । तुम इधर' भी और उधर भी हो । इस समय तुम सब खा सकते हो ।
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(भक्तों से) ‘‘शूकर-मांस खाकर भी अगर किसी का ईश्वर की ओर झुकाव हो, तो वह धन्य है और निरामिष-भोजन करने पर भी अगर किसी का मन कामिनी और कांचन पर लगा रहे, तो उसे धिक्कार है ।
"मेरी इच्छा थी कि लोहारों के यहाँ की दाल खाऊँ बचपन की बात है । लोहार कहते थे, ब्राह्मण क्या खाना पकाना जाने ? खैर, मैने खाया, परन्तु उसमें लोहारी बू मिल रही थी । (सब हँसते है ।)
(क्रमशः)

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