गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९६

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९६)*
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*अथ राग कल्याण ३*
*(गायन समय संध्या ६ से ९ रात्रि)*
*९६. उपदेश चेतावनी । त्रिताल*
*मन मेरे कछु भी चेत गँवार !*
*पीछे फिर पछतावेगा रे, आवे न दूजी बार ॥टेक॥*
*काहे रे मन भूल्यो फिरत है, काया सोच विचार ।*
*जिन पंथों चलना है तुझ को, सोई पंथ सँवार ॥१॥*
*आगै बाट बिषम जो मन रे, जिमि खांडे की धार ।*
*दादू दास सांई सौं सूत कर, कूड़े काम निवार ॥२॥*
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भा० दी०-हे मन: ! त्वं न चेतसि, अतो मुग्धमसि । अन्ते पश्चात्तापं विधास्यसि । नहि पुन: पुनरिदं मनुष्यं शरीरं लभ्यते केनाऽपि । हे मूढमनः । त्वं प्रभुं विस्मृत्य विषयेषु भ्राम्यसि । शरीरं नश्वरं मत्वा शीघ्रं भक्तिमार्गमनुसर । अस्मिन् मार्गे बहवः कामक्रोधादय: शत्रवः प्रतिबन्धका: स्युः । अतोऽसिधारावदयं मार्ग: सर्वथा दुर्गम: । सावधानेन त्वयाऽस्मिन् मार्गे पदं निधेयम् । दुष्कृतकर्माणि विहाय सत्कर्मभिः प्रभुणा स्नेहो विधेयः । तदैव तव कल्याणं निर्वहत् । हे मन: ! निरालस्यं सत् प्रभुं भज । तदैव प्रभुं द्रष्टुं शक्ष्यसि । 
अध्यात्मरामायणे-अयोध्या 
कामक्रोधादयस्तत्र शत्रवः शत्रुसूदन । 
तत्राऽपि क्रोध एवालं मोक्षविघ्नाय सर्वदा । 
श्रूयतां परमार्थोऽयं हनुमत् वायुनन्दनः ।

स्कन्देऽप्युक्तम् 
अस्मिन् संसारगर्तेतु किञ्चित् सौख्यं न विद्यते ।
प्रथमं जन्तुराप्नोति जन्म बाल्यं तत: परम्॥
पश्चाद्यौवनमाप्नोति ततो वार्धक्यमश्नुते ।
पश्चान्मृत्युमाप्नोति पुनर्जन्म तदश्नुते ।
अज्ञानवैभवादेव दुःखमाप्नोति मानवः ।
तदज्ञान- निवृत्तौ तु प्राप्नोति सुखमुत्तमम् ।
अज्ञानस्य निवृत्तिस्तु ज्ञानादेव न कर्मणा ।
ज्ञानं नाम परं ब्रह्म ज्ञानं वेदान्तवाक्यजम् ।
तज्ञाने च विरक्तस्य जायते नेतरस्य हि ।
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हे साधक मन ! तू मूर्ख है जो सावधान नहीं रहता है । यह मनुष्य शरीर जब नष्ट हो जायगा तब तुझे पछताना पड़ेगा क्योंकि यह मनुष्य शरीर बार-बार में किसी को भी नहीं मिलता है । हे मूर्ख मन ! तू प्रभु को भूलकर विषयों में भ्रमण कर रहा है । यह शरीर तो नश्वर है । अतः शीघ्र ही भक्ति मार्ग को पकड़ ले, फिर इसको नहीं छोड़ना । 
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इस मार्ग में चलने वाले के लिये रास्ते में महा भयंकर काम-क्रोध आदि शत्रु हैं । इस मार्ग में चलना तलवार की धार पर चलने के समान अति कठिन है । सावधान होकर ही इस मार्ग पर पग रखना । अब तुम बुरे कर्मों को छोड़ कर सत्कर्मों द्वारा प्रभु से प्रेम करो, तब ही तुम्हारा कल्याण होगा । आलस्य को त्याग कर भगवान् का भजन करो । जिससे तुम्हें भगवान् के दर्शन हो जायँ । 
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अध्यात्म रामायण में – 
हे शत्रु-दमन ! इस साधन मार्ग में काम, क्रोध आदि बहुत से शत्रु हैं जो साधक को आगे बढ़ने में रोकते हैं । क्रोध तो महाभयंकर शत्रु है जो अकेला ही मोक्ष-मार्ग में बाधा उत्पन्न कर देता है तो फिर औरों की तो बात ही क्या कहनी है । 
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स्कन्दपुराण में –
हे वायुनंदन ! तुम मेरे से परमार्थ की बात सुनो । यह संसार एक गड्ढे के समान है । इसमें कुछ भी सुख नहीं । यहाँ पर पहले तो जीव का जन्म होता है, बाद में उसकी बाल्यावस्था आ जाती है, फिर वह जवान हो जाता है, उसके बाद बुढापा आ जाता है । तदनन्तर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । मृत्यु के बाद फिर जन्म का कष्ट भोगता है । 
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इस प्रकार अज्ञान के कारण ही मनुष्य दुःख पाता है । अज्ञान के निवृत्त हो जाने पर उसे उत्तम सुख की प्राप्ति होती है । अज्ञान की निवृत्ति ज्ञान से होती है, कर्म से नहीं । ज्ञान परब्रह्म परमात्मा का ही नाम है । वेदान्त वाक्य के श्रवण-मनन से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह विरक्त पुरुषों को ही होता है, दूसरों को नहीं । अतः संसार से विरक्त होकर भगवान् का भजन करो ।  
(क्रमशः) 

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