गुरुवार, 2 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(९/१२)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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संतोष सु साहिब१ लूंडा२ लोभ, जसे थे तैसी कहि शोभ ।
साँच कहत मान हु मत रोस, दुवा३ देहु भावों४ दिन दिन कोस५ ॥९॥
संतोष तो स्वामी१ है और लोभ दास२ है । जैसे थे वैसी ही इनकी शोभा कही है । सत्य कहने पर रोस नहीं मानना चाहिये, फिर तुम्हारी इच्छा है, चाहे४ आशीर्वाद३ दो वा प्रतिदिन शाप५ देते हुये गालियां दो ।
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तमा१ कनीज कि चेरी चाहि, उभय नाम लौंडी२ है आहि ।
सबै जीव बांदी३ के बांदा४, रज्जब कहत न राख्या छांदा५ ॥१०॥
चाह१ ही कनीज है और चाह ही चेरी है । कनीज और चेरी दोनों ही नाम दासी२ के है । सभी जीव चाह रूप दासी३ के दास४ है यह हमने ठीक ही कहा है, कपट५ नहीं रक्खा है ।
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आशा बंधण आतमा, मुक्त निराशा नित्त ।
रज्जब कही विचार करि, शोधर१ साधू मत्त२ ॥११॥
जीवात्मा को आशा से ही बन्धन है, आशा रहित तो नित्य मुक्त ही होता है । यह हमने संतों के सिद्धान्त२ की खोज१ करके ही तथा स्वयं विचार करके ही कहा है ।
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सहकामी कंचन किया, तिनको जब तब फेर१ ।
निष्कामी पलटै नहीं, साखी सोवन२ मेर३ ॥१२॥
सकामी पारस द्वारा बनाये हुये सोने के समान हैं । जैसे वह सोना जब तब बदलता ही है, वैसे ही साकामी अपने को कंचन के समान स्वच्छ बना लेता है किंतु उनको जब तक बदलकर१ पूर्वावस्था में आना ही पड़ता है और निष्कामी वास्तविक सोने के समान है वह कभी नहीं बदलता । इसकी साक्षी सुवर्ण२ का पर्वत सुमेरु३ देता है ।
(क्रमशः)

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