सोमवार, 20 सितंबर 2021

*सरलता तथा ईश्वर-प्राप्ति*

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*दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।*
*दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सजीवन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*सरलता तथा ईश्वर-प्राप्ति*
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"विजय बड़ा सरल है । खूब उदार और सरल हुए बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते ।
"कल विजय अधर सेन के यहाँ गया हुआ था । व्यवहार ऐसा था, जैसे अपना मकान हो सब अपने आदमी हों ।
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“विषय-बुद्धि के गये बिना कोई उदार और सरल नहीं होता ।
“मिट्टी बनायी हुई न हो, तो उसके बरतन नहीं बन सकते । भीतर बालू या कंकड़ के रहने पर बरतन चिटक जाते हैं; इसीलिए कुम्हार पहले मिट्टी बनाता है ।
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"आईने में गर्द पड़ गयी हो तो उसमें मुँह नहीं दिखायी पड़ता । चित्त-शुद्धि के हुए बिना अपने स्वरूप के दर्शन नहीं होते ।
"देखो न, जहाँ अवतार है वहीं सरलता है । नन्द, दशरथ, ये सब सरल थे ।
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"वेदान्त कहता है, बुद्धि की शुद्धि हुए बिना ईश्वर के जानने की इच्छा नहीं होती । अन्तिम जन्म या अर्जित तपस्या के बिना उदारता या सरलता नहीं आती ।”
(क्रमशः)

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