सोमवार, 20 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१११

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१११)*
.
*अथ राग अडाणा ५*
*(गायन समय मध्य रात्रि १२ से ३ बजे)*
*१११. गुरु सामर्थ महिमा । त्रिताल*
*भाई रे ऐसा सतगुरु कहिये, भक्ति मुक्ति फल लहिये ॥टेक॥*
*अविचल अमर अविनाशी, अठ सिधि नव निधि दासी ॥१॥*
*ऐसा सतगुरु राया, चार पदारथ पाया ॥२॥*
*अमी महारस माता, अमर अभय पद दाता ॥३॥*
*सतगुरु त्रिभुवन तारे, दादू पार उतारे ॥४॥*
.
सद्गुरुलक्षणमाह श्रीदादूदेव:-
भा० दी०-हे भ्रात: ! भक्तिमुक्तिफलदातृतया सद्गुरुरित्युच्यते । तत्रैव तत्पदवाच्यता संगच्छते । यस्य निष्कलेऽमरेऽविनाशिनि ब्रह्मण्यभेदनिष्ठा स्यात् तस्याष्टसिद्धयो नवनिधयश्च दासी- स्वभावोपेता सेवायामुपतिष्ठन्ते । योहि लब्धधर्मार्थकाममोक्षोऽद्वैतामृतसिन्धुनिमग्नः संसारसागरा-त्साधकं पारं तारयति ।
अष्टावक्र उपदिशति जनकम्-
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज । 
 क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज ॥
न पृथ्वी न जलं चाग्निर्न वायुयौ र्वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
यदि देहं पृथक्-कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि ॥
.
हे भाई ! भक्ति और मुक्ति का फल देने वाला ही सद्गुरु होता है । स्वयं निश्चल, अमर, अविनाशी ब्रह्म में अभेद निष्ठा रखता हैं अष्ट-सिद्धि नवनिधियाँ जिसकी दासी की तरह सेवा में उपस्थित रहती हों, जो गुरु स्वयं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करके अद्वैतामृत महारस में डूबा हुआ साधकों को अमर और अभय पद प्रदान करता है ।
.
ऐसा सद्गुरु त्रिलोकी के विषयों की आशा को नष्ट करके साधक को संसार से पार कर देता है । जैसे अष्टावक्रजी राजा जनक को उपदेश दे रहे हैं कि हे राजन् ! यदि मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष की तरह त्याग दे और क्षमा, नम्रता, दया, संतोष, सत्य को मृत की तरह पान करो किन्तु मुक्ति के लिये तू इन सब का अपने आपको साक्षी जान ।
.
अगर तू देह को अलग करके चैतन्य आत्मा में विश्राम करके अर्थात् चित्त को एकाग्र करके स्थित है तो अभी तू सुखी और शान्त होता हुआ मुक्त हो जायगा ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें