सोमवार, 20 सितंबर 2021

*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२(९/१२)*

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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।* *यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२*
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साँच आतमा झूठ तन, लागिर झूठी होय ।
रज्जब कही विचार करि, देखत हैं सब कोय ॥९॥
आत्मा सत्य है, शरीर मिथ्या है किन्तु मिथ्या शरीर के साथ लग कर सत्य आत्मा भी झूठी हो रही है । यह हमने विचारपूर्वक ही कहा है और सब देखते भी हैं ।
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झूठ बोलिये धर्म हित, सो मिलै साँच को जाय ।
यहु रज्जब अज्जब१ कही, नर देखो निरताय२ ॥१०॥
धर्म के लिये जो झूठ बोला जाता है, वह तो सत्य को ही जा मिलता है अर्थात सत्य के समान ही हो जाता है । हमने यह अदभुत१ बात कही है । हे नर ! तुम भी विचार२ करके देख लो, यह ऐसी ही बात है ।
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झूठ पाप का मूल है, समय सु मिथ्या साच ।
मार मुहम्मद की शरण, क्या बोलै सो बाच ॥११॥
झूठ पाप का मूल कारण है किंतु किसी समय मिथ्या ही सत्य के समान सुन्दर हो जाता है । मार के भय से मुहम्मद गौरी तथा मुहम्मद गजनी की शरण होने वाले क्या वचन सत्य बोलते ? उन्होने मिथ्या बोलकर के ही अपने प्राण बचाये थे और वह मिथ्या सत्य के समान ही हुआ था ।
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रज्जब राख्या१ मारत हु, झूठ बोल कर प्राण ।
सो मिथ्या मानी सब हु, सांई सहित सुजाण ॥१२॥
जिन लोगों ने मुहम्मद गौरी आदि के मारते समय झूठ बोलकर अपने प्राणों की रक्षा१ की, उस झूठ को प्रभु के सहित सभी बुद्धिमानों ने सत्य समान श्रेष्ठ ही माना था ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित झूठ साँच निर्णय का अंग १६२ समाप्तः ॥सा. ५०६७॥
(क्रमशः)

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