शनिवार, 18 सितंबर 2021

*अनन्तानन्दजी के शिष्य*

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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख ।*
*नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अनन्तानन्दजी के शिष्य*
*छप्पय -*
*जन राघव राम हि मिले, ये दाता आनन्द कंद के ॥*
*कर्मचन्द क्रम गलित, योग योगानँद पायो ।*
*पय हारी सु प्रसिद्ध, समझ सारी हरि गायो ।*
*मगन मनोरथ अल्ह, भयो श्रीरंग राम रत ।*
*कियो गयेश प्रवेश, मेहा मन दियो परमतत ॥*
*येते आठों अटल शिष, स्वामि अनन्तानन्द के ।*
*जन राघव राम हि मिले, ये दाता आनन्द-कंद के ॥१७४॥*
जीवों को आनन्द-कंद ब्रहा का साक्षात्कार कराने वाले ये आठ अनन्तानन्द जी के शिष्य राम का भजन करके राम में ही मिले हैं - १. कर्मचन्दजी – इनकी, जन्म-मरण आदि क्रम-व्यवस्था गलित अर्थात नष्ट हो गई थी । आप अति राम नामानुरागी, साधु सेवी तथा गुरु भक्ति निष्ठ थे । २. योगानन्द जी – आपने योग साधना द्वारा प्रभु को प्राप्त किया था । ३. पयहारी कृष्णदास जी अति प्रसिद्ध हैं ही । ४. सारीरामदास जी - इनने विचार पूर्वक हरि यश तथा नाम का गान किया था ।
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एक समय आप कृपा करके चित्रकूट के पास 'त्वर्रा' ग्राम में वहां के लोगों को विशेष रूप से चेतावनी देने को गये थे । कारण - उस ग्राम के लोग वैष्णवों के द्रोही थे । एक घर के द्वार पर आप पहुँचे, किन्तु घर वाले ने इनको वहां खड़े भी नहीं होने दिया । आप नदी तट जाकर बैठ गये । उसी दिन वहां के राजा का पुत्र मर गया था । उसको नदी तट लाये तब आपने कहा - यहां की प्रजा और राजा यह प्रतिज्ञा करे कि हम वैष्णवों की सेवा करेंगे, तो यह हरि कृपा से जीवित हो जायगा । सुबुद्धि मंत्री के परामर्श से राजा प्रजा ने उक्त प्रतिज्ञा कर ली । तब लड़के को जीवित कर दिया । इस प्रकार उस प्रदेश को आपने हरि भक्त बनाया था ।
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५. अल्हजी - आप अपने हरि भक्ति रूप मनोरथ में निमग्न रहते थे । इनकी कथा भी आगे आ रही है । ६. श्रीरंग जी भी श्री रामरंग में रत हुए रहते थे । इनकी कथा भी आगे आ रही है । ७. गयेश जी अनन्तानन्द जी के विशेष कृपा पात्र शिष्य थे । आपकी भगवद् भक्ति श्लाघनीय थी । आपने भक्ति द्वारा ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म स्वरूप में ही प्रवेश किया था । ८. मेहाजी ने परम तत्त्व में ही मन लगाया था ।
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कुछ सज्जन कहते हैं - जैसे मेह (मेघ) मंगल रूप है वैसे ही नरहरिदास जी के दर्शन से मंगल का उदय होता था, इससे नरहरिदास जी ही मेहा शब्द से कहे गये हैं । कुछ सज्जन यह भी कहते हैं कि यही नरहरिदास जी मानसकार तुलसीदास जी के गुरु थे । किसी ने कहा है - नरहरिदास जी श्रीरंग जी के शिष्य थे । पहले नरहरिदास जी एक समय जगन्नाथ जी के दर्शन करने गये थे । साष्टांग दंडवत करते समय आपके मन में भाव उठा, साष्टांग दंडवत करने से तो उतने समय तक दर्शन नहीं होने से असह्य विक्षेप होगा ।
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इससे आप उलटे पड़ गये । पंडों ने यह अनाचार समझ कर, इनको पकड़ कर मंदिर के बाहर निकाल दिया । किन्तु श्री जगन्नाथ जी की कृपा युक्त आज्ञा हुई - ये मेरे भक्त हैं । इनका उक्त चरित्र अनाचार नहीं है किन्तु प्रेमभाव से परिपूर्ण अपना निछावर है । तब सबने आपका अत्यधिक समादर किया । स्वामी अनन्तानन्द जी के इतने शिष्य हुए हैं और ये आठों ही गुरु सेवा में तथा भगवद् भक्ति में अडिग रहे हैं
(क्रमशः)

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