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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ हरि अपने पूजक का कार्य शीघ्र करते हैं ॥*
निज पूजक के कार्य में, देर करे हरि नाँहि ।
कर्मानन्द की छड़ी झट, लाय धरी कर माँहि ॥१४१॥
दृष्टांत कथा – कर्मानन्दजी जाति के चारण थे, वे तीर्थ यात्रा करने निकले थे । भगवत् सिंहासन को शिर पर और हाथ में एक दो साखा वाली छड़ी रखते थे । जहां ठहरते वहां छड़ी को भूमि में गाड करके सिंहासन उस पर लटका देते थे । एक दिन भजन में मन रहने के कारण छड़ी भूल करके आगे चल पड़े । फिर जहां ठहरे तब छड़ी नहीं है यह ज्ञात हुआ । अब सिंहासन किस पर लटकावें । पीछे जाकर छड़ी लाना कठिन था । दिन भर की यात्रा से थक चुके थे ।
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प्रेमपूर्वक भगवान् से प्रार्थना करने लगे – ' भगवन् ! सेवक के किसी कार्य में भूल होजाय तो स्वामी का अधिकार होता है की उसे याद करादे । फिर अन्त:करण के प्रेरक भी तो आप ही हैं । इसलिए छड़ी भूलने का दोष किसका है वह आप ही विचारलें' ।' यह प्रेमपूर्ण प्रार्थना सुनकर तत्काल भगवान् ने छड़ी लाकर उनके हाथ में दे दी । इससे सूचित होता है की भगवान् अपने पूजक का कार्य करने में देर नहीं करते ।

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