शनिवार, 18 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १८१/१८४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १८१/१८४*
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कहि जगजीवन कुसंगति, हरि बिच अंतर होइ ।
सत संगति मंहि रांम रस, दुख नहिं ब्यापै कोइ ॥१८१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि, कुसंग करने से जीव की प्रभु से दूरी बढती है । और सत्संग करनेवाले को राम नाम रस मिलता है जिससे कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
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इस बरतनि७ बरतै नहीं, हरिजन हरि का होइ ।
कहि जगजीवन नांम मंहि, जे मन राखै कोइ ॥१८२॥
{७. बरतनि=वर्तनी(लोकव्यवहार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो रामनाम में रत रहे ऐसा व्यवहार कोइ नहीं अपनाता अगर कोइ अपनाये तो वह तो वह जन प्रभु का ही होकर रहे ।
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अचाहीक१ हरि नांम ले, अैसा कोइ एक ।
जगजीवन चाही२ कहै, जग मंहि जीव अनेक ॥१८३॥
(१. अचाहीक=निष्काम भावना से) (२. चाही=स्वार्थ भावना से)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो निष्काम भाव से प्रभु भजन करें ऐसा कोइ विरला जन ही है । अपने स्वार्थ के लिये तो उन प्रभु को जन भांति भांति से भजते हैं ।
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जे आखौ३ सोई सबद४, गरुड़५ सुनावै साखि ।
कहि जगजीवन हेत हरि, रांम ह्रिदा महिं राखि ॥१८४॥
(३. आखौ=कह दो) (४. सबद=भगवान् का नाम या गुरु का उपदेश) (५. गरुड़=गरुड़पुराण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह ही शब्द उच्चारण करो जिसका प्रमाणिकरण गरुड़ पुराण में भी किया गया है उसके अनुसार प्रभु से स्नेह व मन में राम नाम रखें ।
(क्रमशः)

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