सोमवार, 13 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १६१/१६४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १६१/१६४*
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एक तार कौ एकलस१, परकालौ२ किहिं दीन्ह । 
कहि जगजीवन संधि बुनि, सब जन साबित३ कीन्ह ॥१६१॥
(१. एकलस=एकरस= निरन्तर)   (२. परकालौ=वृत्तमापक यन्त्र)   (३. साबित=पूर्ण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे एक सामान्य गणित का यंत्र  जिसे प्रकार कहते हैं पूरे वृत की परिधि का मापन कर देता है ऐसे ही सबकी मतिनुसार परमात्मा भी सबके कर्म नाप कर उन्हें उचित स्थान देते हैं ।
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कहि जगजीवन कातताँ, बुनता टूटै तार । 
जतन जतन करि जोरि मन, परकालौ करि सार ॥१६२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में विचरण करते हुये कर्मों का क्षय संचय होता रहता है । पर सावधान करते संत कहते हैं कि जैसे सूत कातते व बुनते समय तार टूटते रहते हैं कुशल कारीगर उन्हें पुनः जोड़ते रहते हैं । इसी प्रकार हमें भी अपने सत्कर्मों का क्षय नहीं होने देना है क्योंकि परमात्मा कैसा भी घुमाव हो प्रकार की भांति मापन खरा करेंगे ।
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कोई खावै कोई पिवै, कोइ ले कोइ दे आइ । 
कहि जगजीवन हेत हरि, परमेसुर कै भाइ ॥१६३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ दिखाने के लिये भले ही लेवे या देवे किंतु परमात्मा तो उन्हें ही अपना भाई समझते हैं जो उनसे स्नेह रखते हैं।
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परमेसुर कै भाइ सब, परमारथ हरि प्रीति । 
कहि जगजीवन सत धरम, ऐ साधन की रीति ॥१६४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी परमात्मा के भाई हैं जो परोपकारी व उनसे स्नेह रखते हैं । यह ही धर्म का सार व व सच्चे साधन अर्थात परमात्मा को पाने की रीति है ।
(क्रमशः)

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