सोमवार, 13 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०५

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०५)*
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*१०५. माया । मल्लिका मोद ताल*
*काहू तेरा मर्म न जाना रे, सब भये दीवाना रे ॥टेक॥*
*माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे ।*
*को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥१॥*
*माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे ।*
*विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥२॥*
*आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे ।*
*दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥३॥*
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भा० दी०-हे प्रभो ! भवदीयं रहस्यमयं स्वरूपमिह संसारेऽसारे कोऽपि ज्ञातुं न शक्नोति किन्तु सर्वेऽपि प्राणिनो विषयाऽऽसक्त्या मदोन्मत्तष्ठ त्वामपि विस्मरन्ति न च कस्याप्युपदेशं ते श्रृण्वन्ति । किन्तु मायामोहिता विषयविषममृतमिव पीत्वा प्रसन्नात्मान आत्मानं सर्वश्रेष्ठं मन्यन्ते । विषयरसे निमग्ना: तमेव सत्यमित्यामनन्ति । विषयेष्वेव जन्मजन्मान्तरे धावन्ति । किंबहुना, बुद्धिमन्तोऽपि विषयरसाकृष्टा भगवन्तं विस्मरन्ति ।

उक्तं हि योगवासिष्ठे-
किं नामेदं वत सुखं येयं संसारसंततिः ।
जायते मृतये लोको प्रियते जननाय च ॥
अस्थिरा: सर्व एवेमे सचराचरचेष्टिता: ।
आपदां पतय: पापा भावा विभवभूमय: ॥

असतैव वयं कष्टं विकृष्टा मूढबुद्धयः ।
मृगतृष्णाम्भसा दूरे वने मुग्धमृगा इव ॥ 
न केनचिच्च विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः ।
वत मूढा वयं सर्वे जानाना अपि शाम्बरम् ॥
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हे प्रभो ! आपके इस रहस्यमय स्वरूप को इस संसार में कोई भी प्राणी नहीं जान सकता । सभी जगत् के प्राणी विषय रस में डूबे हुए पागल होकर भगवान् को भी भूल गये हैं । कोई किसी के ज्ञान की बात को भी नहीं सुनता, किन्तु माया से मोहित हुए विषय-रस का पान करके प्रसन्न मन से अपने आप को ही श्रेष्ठ बतलाते हैं । 
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उसी विषय-रस में डूबे हुए उसी को सत्य मान कर जगत् में भ्रमण कर रहे हैं । जन्मजन्मान्तरों तक उसी विषय-रस के लिये ही दौड़ते रहते हैं । अधिक क्या कहूं, बुद्धिमान् मनुष्य भी उस विषय रस को देख कर भगवान् को भूल जाते हैं । 
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योगवासिष्ठ में कहा है कि –
इस संसार में क्या सुख है ? कुछ भी नहीं, क्योंकि इसमें जो जीव पैदा होता है, वह मरने के लिये ही पैदा होता है । जो मरते हैं, वे जन्मने के लिये ही मरते हैं । चर-अचर प्राणियों की चेष्टा के विषय तथा केवल वैभव काल में रहने वाले ये जितने भोग के साधनभूत पदार्थ हैं, वे सब के सब क्षण-भंगुर हैं और विपत्ति में डालने वाले पाप रूपी हैं ।
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मृगतृष्णा के पानी की तरह मूढ बुद्धि वाले लोग संसार के पदार्थों में सुख न होने पर भी उनमें सुख मान बैठते हैं । उनके लोभ से आकृष्ट होकर इधर-उधर मृग की तरह संसार-वन में भटकते रहते हैं । यहाँ पर लोग किसी के द्वारा बेचे नहीं गये हैं, फिर भी बेचे हुए की तरह परवश हो रहे हैं । इस बात को जानते हुए भी यह सब माया का खेल, फिर भी हम सब मूढ बने बैठे हैं, सब से मुक्त होने का कोई प्रयत्न ही नहीं करते । यह कितने खेद की बात है ।
(क्रमशः)

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