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*एक सेर का ठांवड़ा, क्योंही भर्या न जाइ ।*
*भूख न भागी जीव की, दादू केता खाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साच का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सुरसुरानन्दजी*
*सुरसुरानन्द साचै मतै, महा-प्रसाद सब मानियो ॥*
*चले जात मग मध्य, जीमिये बरा वाक छल ।*
*पीछे पाये शिषन, देख स्वामी की शुभ चल ॥*
*उनसे आपन कह्यो, वमन करि नाखि अभागे ।*
*उन फिरि कोन्हों ढेर, जिसे खाये थे आगे ॥*
*स्वामि सुरसुरी ऊगले, पुष्प बताशे जानियो ।*
*सुरसुरानन्द साचै मतै, महा प्रसाद सब मानियो ॥१६९॥*
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सुरसुरानन्द जी राजगुरु थे, संतों की सेवा अति प्रेम से किया करते थे । आपका जन्म वैशाख कृ. ९ गुरुवार को हुआ था । आप स्वामी रामानन्द जी के शिष्य थे । आपने भक्ति ग्रन्थों में कथित भगवत् प्रसाद की महिमा प्रत्यक्ष रूप में दिखाई थी । आप जो भी पाते थे उन सबको यथार्थ रूप से महा प्रसाद रूप ही मानते थे । एक समय आप शिष्यों के साथ मार्ग में चले जा रहे थे । किसी दुष्ट ने मांस मिश्रित उड़द के बड़ों पर तुलसी दल छोड़कर, वचन से छल करते हुए सामने लाकर कहा - यह भगवत् प्रसाद है, लीजिये जीमिये । आपने उसे वास्तव में महा-प्रसाद मानकर किंचित्-सा हाथ में लेकर पाया ।
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पीछे से आने वाले शिष्यों से भी उसने कहा – भगवत् प्रसाद पाइये । शिष्य भी गुरु स्वामी की महा-प्रसाद पाने की शुभ चाल को देखकर स्वाद बुद्धि से इच्छानुसार बहुत बहुत खाकर गुरुजी के पास आये ।
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तब गुरुजी ने कहा – अभागे लोगों ! तुमने पूर्ण भाव और विश्वास बिना ही बड़े क्यों खाये हैं ? शीघ्र वमन करो । उन सब ने वमन किया तो जैसे खाये थे, वैसे ही मांस मिश्रित बड़ों का अपने आगे पृथ्वी पर ढेर लग गया ।
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फिर सुरसुरी के पति सुरसुरानन्द जी ने वमन किया, तब उनकी वमन में तुलसी दल, बताशा और पुष्प जानने में आये अर्थात् महा प्रसाद ही निकला ।
(क्रमशः)

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