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*दादू सुख सांई सौं, और सबै ही दुख ।*
*देखूँ दर्शन पीव का, तिस ही लागे सुख ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*धना की पद्य टीका*
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*इन्दव -*
*खेत कथा कहि दी सब राघव,*
*फेरि सुनो इक पैल भई है ।*
*वैष्णव ब्राह्मण सेव करी घर,*
*देखि ठर्यो मन माँगि लई है ॥*
*गोल सु अश्म उठाय दियो वह,*
*लेत भयो अति बुद्धि दिई है ।*
*भोग लगावत आड करावत,*
*ग्रास न खावत चिन्त नई है ॥१६४॥*
धना भक्त के बिना बीज खेत में उत्पन्न होने की कथा तो स्वामी राघवदास जी ने कथन करदी ही है । अब पुनः एक कथा और सुनो जो उक्त कथा से पहले की है अर्थात् धना की पांच वर्ष की अवस्था की घटना है ।
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एक वैष्णव ब्राह्मण इनके पिता के घर पधारे थे । वे स्नान संध्यादि से निवृत्त हो, बटुवा से शालग्राम निकाल कर उस की पूजा करने लगे फिर भोग लगाया । बालक धना पास बैठा हुआ यह सब देख रहा था । इससे धना के मन को बड़ी शांति मिली । उसने विचारा मेरे पास भी मूर्ति हो तो मैं भी इस प्रकार पूजा करूं । ब्राह्मण से धना ने शालग्राम की मूर्ति मांगी ।
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पहले तो ब्राह्मण ने कुछ ध्यान नहीं दिया । किन्तु बालक ने जब अत्यन्त विनम्र होकर प्रार्थना करी । तब एक सुन्दर गोल पत्थर उठाकर उसे दे दिया और कहा - ये तुम्हारे भगवान् हैं । तुम इनकी नित्य पूजा किया करो और इनके भोग लगाये बिना भोजन नहीं करना । ब्राह्मण तो यह कहकर चले गये । धना उसको लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ और अपनी बुद्धि विशेष रूप से उसी में लगाई ।
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पूजा करके भोग लगाता था, आडा पड़दा लगाता था किन्तु भगवान् एक ग्रास भी नहीं खाते थे । इससे धना को यह एक नई चिन्ता हो गई थी ।
(क्रमशः)

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