गुरुवार, 2 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १२५/१२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १२५/१२८*
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भीख बड़ा दरबार२ की, कोइ जन जाचै ताहि ।
कहि जगजीवन द्रवै हरि, सकल लोक सुख पाइ ॥१२५॥
(२. बड़ा दरबार=भगवान् का मन्दिर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के दरबार की खैर या दात या भिक्षा ही बड़ी कोइ भी वहां जाकर मांगे तो सही । फिर प्रभु दया करके ऐसी कृपा करेंगे कि जीव सकल लोक में सुखी होगा ।
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भीख बड़ा दरबार की, तीन्यूं लोक पलंत३ ।
कहि जगजीवन रांम रस, मांगत जोहि मिलंत ॥१२६॥
(३. पलंत=पालन पोषण होता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उस दरबार की भिक्षा बहुत बड़ी है जिससे तीनोँ लोक पोषित होते हैं । राम नामरस ऐसा है कि जो मांगते हैं वही मिल जाता है ।
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भीख बड़ा दरबार की, जन जाचै जस गाइ ।
कहि जगजीवन नांम लहै, आनंद अंग न माइ ॥१२७॥
संतजगजीवन जी कहते है कि उस दरबार का दिया बहुत पूरक है इसका प्रमाण जीव महिमा गाकर पा सकते हैं । उन प्रभु का नाम मात्र लेने से ही आनंद अपरिमित हो जाता है ।
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भीख बड़ा दरबार की, भाव भगति रस येह ।
कहि जगजीवन बिलसिये, तो सुख पावै देह ॥१२८॥
संतजगजीवन जी कहते है कि उस दरबार का देना बहुत बड़ा है । यह भाव भक्ति व प्रेम से मिलता है । जो इसकी वांछना करता है तो वह देह सदा सुखी रहती है ।
(क्रमशः)

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