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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०९)*
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*१०९. परिचय । भंगताल*
*ऐन एक सो मीठा लागै,*
*ज्योति स्वरूपी ठाढ़ा आगे ॥टेक॥*
*झिलमिल करणां, अजरा जरणां,*
*नीझर झरणां, तहँ मन धरणां ॥१॥*
*निज निरधारं, निर्मल सारं, प्राण अधारं ॥२॥*
*अगहा गहणां, अकहा कहणां,*
*अलहा लहणां, तहँ मिल रहणां ॥३॥*
*निरसंध नूरं, सब भरपूरं, सदा हजूरं, दादू सूरं ॥४॥*
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भा० दी०-यथार्थ ज्योति:स्वरूपमद्वैतं ब्रह्मज्ञानं मया यदनुभूतं तदेव मेऽतिप्रियं तात्विकं प्रतिभाति । तस्य प्रकाश: सर्वत्र व्याप्नोति । यदुदीर्णं ब्रह्म तद् ब्रह्माण्डमपि निगरति । अत्ता चराचर- ग्रहणादिति ब्रह्मसूत्रोक्तेः । परमानन्दरसस्य श्रोतोऽस्ति य: परमात्मा सर्वरूप: सर्वाधारो निर्मलो विश्वस्वरूप:सर्वप्राणाधारोऽपारतेज:स्वरूपोऽस्ति । स एव मनसि विराजते । अग्राह्यमपि तद् ब्रह्माहं गृह्णामि । अनिर्वचनीयमपि वच्मि । अप्राप्यमपि प्राप्नोमि । नि:सन्धिर्विश्वस्मिन् परिपूर्णः सहस्रसूर्यवत्प्रकाशरूपो य: परब्रह्मपरमात्मा इत्युच्यते तेनैव सहैक्यमनुभूय स्थितोऽस्मि ।
उक्तं कठोप०-
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्या वेद यत्र स: ॥
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अद्वैत स्वरूप तथा ज्योति-रूप ब्रह्म का जो यथार्थ स्वरूप मैंने ज्ञान के द्वारा अनुभव किया है, वह ही मुझे प्रिय लगता है । उसका प्रकाश झिलमिल चमकता हुआ चारों ओर फैल रहा है । जो अजीर्ण ब्रह्माण्ड को भी निगल जाता है । ब्रह्मसूत्र में उसको चराचर जगत् का भक्षण करने वाला बतलाया गया है ।
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परमानन्द रस का तो वह अजस्त्र झरना है, जिससे दिन-रात परमानन्द रस टपकता रहता है । जो निजस्वरूप, निराधार, निर्मल, विश्वरूप, प्राणों का आधार, अपार तेज स्वरूप है वह ही मेरे मन में विराज रहा है ।
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जो कभी पकड़ में नहीं आता, उसको भी मैं पकडूंगा । अकथनीय ब्रह्म का कथन करना, अप्राप्त को प्राप्त करना, हमारा काम है । जो संधि रहित विश्व में परिपूर्ण रहने वाला सूर्य की तरह प्रकाश रूप परब्रह्म परमात्मा है, उसी में मैं अभेद रूप से रहता हूं ।
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कठ. में लिखा है कि –
संहार-काल में काल रूप परमेश्वर के ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि संपूर्ण प्राणी भोजन बन जाते हैं, सब का संहार करने वाली मृत्यु भी जिसकी दाल-भात, चटनी बन जाती है, वह परमेश्वर जहां जैसा है उसको ठीक-ठीक कौन जान सकता है ? अर्थात् अपनी शक्ति से उसको यथार्थ रूप से कोई नहीं जान सकता क्योंकि वह लौकिक ज्ञेय वस्तुओं की तरह बुद्धि के द्वारा जानने में आने वाला नहीं है, फिर भी मैं अनुभव द्वारा उसका साक्षात्कार कर रहा हूं ।
(क्रमशः)

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