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*दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार ।*
*तहँ न सँवारे आपको, जहँ भीतर भरतार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ भेष का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)आचार्य का कामिनी-कांचन त्याग, फिर लोकशिक्षा का अधिकार*
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श्रीरामकृष्ण - जिनके द्वारा वे लोक-शिक्षा देना चाहते हैं, उन्हें संसार का त्याग करना चाहिए । जो आचार्य हैं, उन्हें कामिनी और कांचन का त्याग करना चाहिए । नहीं तो उनके उपदेश लोग मानते नहीं । केवल भीतर ही त्याग के होने से काम नहीं होता । बाहर भी त्याग होना चाहिए । लोक-शिक्षा तभी हो सकती है । नहीं तो लोग सोचते हैं, ये कामिनी और कांचन का त्याग करने के लिए कह तो रहे हैं, परन्तु भीतर ये खुद उसका भोग कर रहे हैं ।
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"एक वैद्य ने रोगी को दवा देकर क.हा, 'तुम किसी दूसरे दिन आना, भोजन आदि की बात बता दूँगा ।' उस दिन वैद्य के यहाँ राब की बहुतसी कलसियाँ भरी थीं । रोगी का घर बहुत दूर था । उसने दूसरे दिन आकर उनसे भेंट की । वैद्य ने कहा, 'खाने पीने में जरा सावधानी रखना, गुड़ खाना अच्छा नहीं ।’ रोगी के चले जाने पर एक आदमी ने वैद्य से पूछा, 'उसे इतनी तकलीफ आपने क्यों दी ? उसी दिन कह देते कि गुड़ न खाना ।'
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हँसकर वैद्य ने कहा, 'इसका एक खास अर्थ है । उस दिन मेरे यहाँ राब और गुड़ के बहुत से घड़े रखे हुए थे । उस दिन अगर मैं कहता तो उसको विश्वास न होता । वह सोचता, जब इन्हीं के यहाँ इतना गुड़ रखा हुआ है, तो ये जरूर कुछ न कुछ गुड़ खाया करते होंगे । अतएव गुड़ कुछ ऐसी बुरी चीज नहीं हो सकती । आज मैंने गुड़ के घड़ों को छिपा रखा है । अब उसे मेरी बात का विश्वास होगा ।
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"मैने आदि-समाज के आचार्य को देखा, सुना, दूसरी या तीसरी बार उसने विवाह किया है ! - लड़के सब बड़े-बड़े हो गये हैं !
“ये ही लोग आचार्य हैं ! ये लोग अगर कहें, ईश्वर सत्य है और सब मिथ्या, इनकी बात का विश्वास भला किसे हो सकता है ?
"जैसा गुरु है, उसको शिष्य भी वैसे ही मिलते हैं । संन्यासी भी अगर मन से त्याग करके बाहर कामिनी और कांचन लेकर रहे, तो उसके द्वारा लोक-शिक्षा नहीं हो सकती । लोग कहेंगे, यह छिपकर गुड़ खाता है ।
"सीती का महेन्द्र वैद्य रामलाल को पाँच रुपये दे गया था । मुझे यह बात मालूम नहीं थी ।
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“रामलाल के कहने पर मैंने पूछा, किसे दिया है ? उसने कहा, यहाँ के लिए । मैने पहले सोचा कि दूधवाले को रुपया देना है, न हो, इन्हीं में से दे दिया जायगा ! हरे-हरे ! जब कुछ रात हुई, तब मैं खाट पर उठकर बैठ गया बड़ी बेचैनी थी । जान पड़ता था, छाती में कोई खरोंच रहा है ! तब रामलाल के पास जाकर मैंने फिर पूछा – ‘उसने तेरी चाची को तो नहीं दिया है ?’ उसने कहा - 'नहीं' तब मैंने कहा, 'तू अभी रुपये लौटा दे ।'
(क्रमशः)

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