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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १५७/१६०*
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नांमदेव का हाथ थैं, प्रीति पिया हरि दुद्ध५ ।
कहि जगजीवन प्रगट पिव, प्रगट किये जन सुद्ध६ ॥१५७॥
(५. दुद्ध=दूध) {६. सुद्ध=शुद्ध(पवित्र)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नामदेवजी के हाथ से प्रभु ने दूध पिया । प्रभु शुद्ध हृदय वालों के साथ स्वयं प्रकट होकर उन्हें धन्य करते हैं ।
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कबीर काया ले रम्यौ, साखि भरैं सब कोइ ।
कहि जगजीवन रांम रति गति, बूझै बिरला कोइ ॥१५८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कबीर साहब अपनी देह धारण कर स्मरण में ही रत रहे । आज भी सभी उनके वचनों को प्रमाणिक मान साक्षी देते हैं । परमात्मा की लीला स्वयं परमात्मा ही जानते हैं । या कोइ विरला संत ही इसे जानता है ।
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पंछी पंख संवारि हरि, अनंत पिया जल७ उडि ।
कहि जगजीवन पंख बिन, रहै पंक८ में बुडि९ ॥१५९॥
(७. पिया जल=गहरे सरोवर) (८. पंक=कीचड़) (९. बुडि=डूब गये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवात्मा ने संसार में आकर ज्ञान व भक्ति रुपी अपने पंखों को संवार कर स्मरण रुपी जल का अनंत यानि बहु तेरा पान किया । अगर ये पंख विकसित न होते तो जीव विषय विकार रुपी कीचड़़ में ही पड़े रहते । इसी संसार में डूबे रहते ।
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तन मंहि रांम सरीर हरि, साध तिरै तिहिं लागि ।
कहि जगजीवन जोति मिलि, जोति जगाई जागि ॥१६०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिस देह में रामाश्रय हो वह देह स्वरूप प्रभु ही हो । सभी साधु जन ऐसे गुरु महाराज का सानिध्य पा भव पार होते हैं । उनकी ज्योति से ही परम तत्व की ज्योति भासती है या जगती है ।
(क्रमशः)

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