शनिवार, 11 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०४

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०४)*
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*१०४. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल*
*पीव तैं अपने काज सँवारे ।*
*कोई दुष्ट दीन कों मारन, सोई गहि तैं मारे ॥टेक॥*
*मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजैं ही सो टारे ।*
*संतन को सुखदाई माधो, बिन पावक फंद जारे ॥१॥*
*तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ, आगम सबै विचारे ।*
*संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अंध कूप में डारे ॥२॥*
*ऐसा है सिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे ।*
*दादू सौं ऐसे निर्बहिये, प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥३॥*
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भा०दी०- भक्तप्रियोभगवान् भक्तान् रक्षतीति निरुच्यते श्रीदादूदेवेन-जगत्पालनप्रक्रिया भगवत्कृपया सततं स्वयमेव प्रचलति । भगवत्प्रियं भक्तं यः कश्चन पीडयति तदा स्वयं भगवान् तं संरक्षति । दुष्टं दण्डयति । यदि भक्तस्य मेरुतुल्यं कष्टं भवेत्तर्हि भगवाननायासेनैव तत्कष्टं क्षणमात्रेणैव क्षपयति । हे माधव ! त्वं भक्तप्रियोऽसि, अतो भक्तान् सुखयसि, भक्तानां श्रेयोविनाशकानि कर्मजालानि भवत्कृपाकटाक्षेनैव नश्यन्ति । हे सर्वज्ञ शक्तिशालिन् परमात्मन् ! त्वं तु सर्वेषां हितं चिन्तयसि, अतस्त्वद्भक्तानां विषये तु किं वक्तव्यम् । तेषां कार्यसिद्धिस्तु संकेतमात्रेणैव सेत्स्यति । भवदवतारः साधूनां परित्राणाय दुष्टानां विनाशनायैव भवति । अतो भवान् दुष्टान् दण्डयति साधूंश्च पालयति । दुष्टास्तव सन्मुखं पराभवन्ति । तव तु सर्वत्रैव विजयो भवति । हे मम प्रियप्रभो ! मदीयां प्रीतिमनुभूय सदैव मां रक्षेति मेऽभ्यर्थना ।
उक्तंहि गीतायाम्-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।
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जगत् पालन का कार्य भगवान् की कृपा से सदा चलता ही रहता है । भगवान् के प्रिय भक्तों को कोई कष्ट देता है तो भगवान् स्वयं उस की रक्षा करते हैं तथा दुष्ट को दण्ड देते हैं । भक्त का यदि सुमेरु तुल्य भी दुःख हो तो भगवान् अनायास ही उसको मिटा देते हैं ।
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हे माधव ! आपको भक्त ही प्रिय लगते हैं । अतः आप उनको सदा सुख देते रहते हैं । भक्तों के कल्याण में जो बाधक कर्मजाल हैं, वे तो भगवान् की कृपाकटाक्ष से स्वयं ही निवृत्त हो जाते हैं । हे सर्व समर्थ परमात्मन् ! आप तो सब का हित चाहने वाले हैं, तो फिर भक्त के हित के विषय में क्या कहना है ? उनका तो अवश्य हित होगा ही और कार्य सिद्धि भी हो जाती है ।
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आपका अवतार दुष्टों के वध के लिये और भक्तों की रक्षा के लिये ही माना गया है । अतः आप भक्तों की रक्षा और दुष्ट को दण्ड देते ही रहते हैं । आपके बल के आगे दुष्ट हारते हैं और आप की ही विजय होती है । हे मेरे परम प्रिय भगवान् ! मेरे प्रेम को देखते हुए आप मेरी सदा ही रक्षा करते रहना, यह ही मेरी प्रार्थना है ।
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गीता में कहा है कि –
जब जब धर्म की हानि व अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं । अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूं । साधु पुरुषों का उद्धार करने और दुष्टों के विनाश के लिये तथा धर्म की स्थापना के लिये युग-युग में मैं प्रकट होता रहता हूं ।
(क्रमशः)

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