शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ २०१/२०४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१८. साध को अंग ~ २०१/२०४*
.
हरि भजि प्रांण विचारि करि, अंग मंहि अंग अनेक ।
कहि जगजीवन नाँउ मूल थिति, जल तरंग बणि एक ॥२०१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव प्रभु का भजन कर विचार कर एक अंग की कामनाएं उसे कितना विस्तार देती है । अतः एक प्रभु का नाम ही सही स्थिति है उसी पर दृढ रहो जेसे जल तो एक है लहरें कितनी ही आकर उससे अपना अपना स्वरूप लेकर बनती मिटती हैं ऐसे ही प्रभु तो एक है जीव उनसे कितने ही वृत्ति स्वरूप ले आचरण करता है संत कहते हैं कि एक नाम स्मरण ही करना चाहिए ।
.
कहि जगजीवन सबद की, रचना अगम अपार ।
प्रेम भगति पारस परस, कंचन करि ले सार ॥२०२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम के शब्द की रचना बहुत गहन गम्भीर है । इसे प्रेम भक्ति रुपी पारस का सानिध्य दे कंचन किया जा सकता है ।
.
जगजीवन सौ बरस कहै, एइ१ सबद ए सखि ।
मन की व्रित्ती सोइ मन, मिलै न अम्रित चाखि ॥२०३॥
(१. एइ=यही)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सो वर्षों तक भी हम चाहे एक ही शब्द या साखी कहते रहें मन की वृत्ति तो वह ही रहेगी जो मूल में है वह साखी कहने से बदलेगी नहीं और इस कारण कह कर भी वह उस अमृत रस का पान नहीं कर सकेगी क्योंकि वह तो कह रही है ह्रदयगंम तो हो ही नहीं रहा है ।
.
प्रिथमी२ जागै जीव सब, सूरज के प्रकास ।
हरिजन जागै हेत हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥२०४॥
{२. प्रिथमी=पृथ्वी(=संसार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी के सभी जीव सूर्य उदय होते ही चेतन हो जाते हैं कोई हरिजन प्रभु के बन्दे प्रभु प्रेम में जगते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें