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*आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै,*
*तिहिं रस मनवा माता ।*
*पान करत परमानन्द पायो,*
*थकित भयो चलि जाता ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २०३)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पयहारी कृष्णदासजी*
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*छप्पय –*
*निर्वेद१ दिपायो२ कृष्णदास,*
*अन्न त्याग पीयो दुगध ॥*
*बड़े तेज के पुंज, राम बल काम संहारे ।*
*चरणांबुज आत-पत्र३, राव राजा शिर धारे ॥*
*जाको दीक्षा दई, तासु तल कर नहिं कीयो ।*
*शरणे आयो कोउ, ताहि निर्भय पद दीयो ।*
*वंश दाहि में रवि प्रकट,*
*साधु खुलैं४ मुदि५ है मुगध६ ।*
*निर्वेद दिपायो कृष्णदास,*
*अन्न त्याग पीयो दुगध ॥१७६॥*
कृष्णदास जी का जन्म जयपुर प्रान्त में दाहिमा ब्राह्मण के घर में हुआ था । आप अनन्तानन्द जी के शिष्य थे । दूध ही पीते थे, इससे इनका पयहारी नाम प्रसिद्ध हो गया था । पयहारी जी ने वैराग्य१ को प्रदीप्त२ किया था अर्थात् उनका वैराग्य तीव्र था । आप अन्न त्याग कर दूध ही पान करते थे । आप तप तेज की महान् राशि थे ।
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आपने राम भक्ति के बल से काम को नष्ट कर दिया था । आपके चरण कमल रूप छत्र३ को राजा राव आदि अपने शिर पर धारण करते थे ।
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आपने जिसको भी दीक्षा देकर शिष्य बनाया था, उसके हाथ के नीचे कभी भी अपना हाथ नहीं किया था अर्थात् उससे कुछ भी नहीं लेते थे । जो कोई भी आपकी शरण आता था, उसे निर्भय परमात्मपद प्राप्ति का उपदेश देते थे ।
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आप दधीचि वंश में सूर्य के समान प्रकट हुए थे । संतों को जिमा४ कर अच्छी६ प्रकार प्रसन्न५ होते थे । कृष्णदास जी पूर्व संस्कार के बल से चौदह वर्ष की अवस्था में ही विरक्त होकर स्वामी अनन्तानन्द जी के शिष्य हो गये थे । कुछ समय गुरु सेवा का सौभाग्य प्राप्त होने के पश्चात् स्वामी रामानन्द जी ने सेवा करने वाले ब्रह्मचारी को शाप दे दिया तब अनन्तानन्द जी को कहला भेजा कि कोई श्रद्धालु शिष्य हमारी सेवा के लिये भेज दो । अनन्तानन्द जी ने कृष्णदास जी को योग्य समझ कर मथुरा जी से गुरु महाराज स्वामी रामानन्द जी के पास काशी भेज दिया था । आपने अपने दादा गुरुजी की सुखप्रद सेवा की और योगमार्ग की सब क्रियायें स्वामी रामानन्दजी से प्राप्त की । स्वामी रामानन्द जी के परमधाम पधार जाने के पश्चात् आपने तीर्थ यात्रा करते हुए पुष्कर में आकर नियमपूर्वक बहुत काल तक राम मंत्र का जप किया । अनुष्ठान की पूर्ति पर रामजी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर वर माँगने को कहा – आपने साष्टांग प्रणाम कर मांगा – आपके चरणों की भक्ति दीजिये । रामजी ने शिर पर अपना वरद हस्त रखकर तथास्तु कहा और दीर्घायु हो यह भी वर दिया फिर अन्तर्धान होकर कृष्णदास जी के हृदय मंदिर में स्थित हुए ।
(क्रमशः)

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