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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११४)*
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*११४. विनती । पंचम ताल*
*बाबा मन अपराधी मेरा, कह्या न मानै तेरा ॥टेक॥*
*माया मोह मद माता, कनक कामिनी राता ॥१॥*
*काम क्रोध अहंकारा, भावै विषय विकारा ॥२॥*
*काल मीच नहिं सूझै, आतमराम न बूझै ॥३॥*
*समर्थ सिरजनहारा, दादू करै पुकारा ॥४॥*
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उक्तंहि नरसिंह पुराणे-
तृणादिचतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधं
चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया ॥
तस्य विष्णोः प्रसादेन यदि कश्चित्प्रबुध्यते ।
स निस्तरति संसारं देवानामपि दुस्तरम् ॥
भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्तत्त्वज्ञानपराङ्मुखः
संसारसुमहापङ्के जीर्णा गौरिव मज्जति ॥
यस्त्वात्मानं निबध्नाति कर्मभि: कोशकारवत् ।
तस्य मुक्ति न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि ॥
तस्मान्नारद सर्वेशं देवानां देवमव्ययम् ।
आराधयेत्सदा सम्यक् ध्यायेद् विष्णुं समाहितः ॥
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हे पितामह परमेश्वर ! मेरा मन महा अपराधी है । मायिक मोह-मद आदि दोषों में उन्मत्त हुआ कनक, कामनियों में ही दिन रात अनुरक्त रहता है । इस मन को काम, क्रोध, अहंकार तथा विषय-विकार ही अच्छे लगते हैं । जाती हुई आयु और आते हुए काल को नहीं देखता । अपने ही स्वरूप राम को जानने का भी प्रयत्न नहीं करता । अतः आप इस मन को समझाओ । ऐसी मेरी प्रार्थना है आपसे, जिससे मैं भवबन्धन से मुक्त हो जाऊं ।
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नरसिंह पु. में लिखा है – तृण से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त जो चार प्रकार के प्राणी हैं, वे तथा समस्त चराचर जगत् जिसकी माया से सुप्त हो रहा है उस विष्णु भगवान् की कृपा से यदि कोई जाग उठे तो वह ज्ञानवान् हो जाता है । वह ही देवताओं के लिये भी दुस्तर इस संसार सागर को पार कर जाता है ।
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जो मनुष्य भोग और ऐश्वर्य के मद से मोहित और तत्त्वज्ञान से विमुख है, वह संसार रूपी महान् कीचड़ में इस तरह डूब जाता है जैसे कीचड में फँसी हुई गाय हो ।
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जो रेशम के कीड़ों की तरह अपने को कर्मों के बन्धनों में बांध लेता है, उसके लिये करोडों जन्मों में भी मुक्ति की संभावना नहीं देखता । इसलिये हे नारद ! सदासमाहित चित्त से सर्वेश्वर अविनाशी देवाधिदेव भगवान् विष्णु का आराधन और ध्यान करना चाहिये ।
(क्रमशः)

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