सोमवार, 13 सितंबर 2021

*भक्तों के साथ कीर्तनानन्द*

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*रस के रसिया लीन भये,*
*सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥*
*दादू अमली बहुरि न आये,*
*सुख सागर ता मांहि समाये ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ६०)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ९५~भक्तों के साथ कीर्तनानन्द*
*(१) अधर के मकान पर*
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आज आश्विन शुक्ला एकादशी है । बुधवार, १ अक्टूबर, १८८४ । श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर से अधर के यहाँ आ रहे हैं । साथ में नारायण और गंगाधर हैं । रास्ते में एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया । श्रीरामकृष्ण भावावेश में कह रहे हैं - "मैं माला जपूँगा ? छिः ! ये शिव पाताल फोड़कर निकले हुए शिव हैं, स्वयम्भू लिंग ।"
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वे अधर के यहाँ पहुँचे । वहाँ बहुत से भक्त एकत्रित हुए हैं । केदार, विजय, बाबूराम आदि सब आये हैं । कीर्तनिया वैष्णवचरण आये हुए हैं । श्रीरामकृष्ण क आज्ञानुसार, रोज आफिस से आते ही, अधर वैष्णवचरण का कीर्तन सुनते हैं । वैष्णवचरण बड़ा मधुर कीर्तन करते हैं ।
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आज भी संकीर्तन होगा । श्रीरामकृष्ण अधर के बैठकखाने में गये । भक्तमण्डली उन्हें देखकर खड़ी हो गयी और चरण-वन्दना करने लगी । श्रीरामकृष्ण ने प्रसन्न-चित्त से आसन ग्रहण किया । उसके बाद उन लोगों ने भी आसन ग्रहण किया । केदार और विजय ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम और नारायण से उन्हें प्रणाम करने के लिए कहा, फिर कहा, आप लोग आशीर्वाद दें, जिससे इन्हें भक्ति हो । नारायण को दिखाकर बोले, यह बड़ा सरल है । भक्तगण नारायण और बाबूराम को देख रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (केदार आदि भक्तों से) - तुम्हारे साथ रास्ते में मुलाकात हुई, नहीं तो तुम लोग काली-मन्दिर जाते । ईश्वर की इच्छा से मुलाकात हो गयी ।
केदार – (विनयपूर्वक) - जो ईश्वर की इच्छा है, वही आपकी इच्छा है । (श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं ।)
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*(२) भक्तों के साथ कीर्तनानन्द*
अब कीर्तन शुरू हुआ । अभिसार से आरम्भ करके रासलीला कहकर वैष्णवचरण ने कीर्तन समाप्त किया । फिर श्रीराधाकृष्ण का मिलन गाया जाने लगा । श्रीरामकृष्ण मारे आनन्द के नृत्य करने लगे । साथ साथ भक्तगण भी उन्हें घेरकर नाचने और गाने लगे । कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय से) - ये बहुत अच्छा गाते हैं ।
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यह कहकर उन्होंने वैष्णवचरण को इशारे से बतला दिया । फिर 'गौरांग-सुन्दर' गाने के लिए उनसे कहा । वैष्णवचरण गाने लगे ।
गाना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण विजय से पूछते हैं “कैसा रहा ?" –
विजय - सुनकर तो मुझे आश्चर्य हो रहा है ।
इसके बाद बड़ी देर तक कीर्तनानन्द होता रहा ।
(क्रमशः)

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