मंगलवार, 21 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.११२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११२)*
.
*११२. गुरुमुख कसौटी । ललित ताल*
*भाई रे, भानै घड़ै गुरु मेरा, मैं सेवक उस केरा ॥टेक॥*
*कंचन कर ले काया, घड़ घड़ घाट निपाया ॥१॥*
*मुख दर्पण मांहि दिखावै, पीव प्रकट आन मिलावै ॥२॥*
*सतगुरु साचा धोवै, तो बहुरि न मैला होवै ॥३॥*
*तन मन फेरि सँवारै, दादू कर गहि तारै ॥४॥*
.
भा० दी०-सद्गुरु कामक्रोधादिदोषान् निरस्य शिष्यस्यान्तःकरणं वैराग्यादिसाधनसंपन्न विदधाति । अतोऽहं गुरोश्चरणसेवकोऽस्मि । स गुरुश्शरीरं मनश्च निर्दुष्टं विधाय प्रभु- साक्षात्कारयोग्यतामापादयति । ज्ञानदर्पण आत्मसाक्षात्कररूपं मुखं दर्शयति । ज्ञानजलेन क्षालितं
शिष्यान्त:करणं न कदाचनाज्ञानान्धकारावृतं भवति । सद्गुरुर्विषयेभ्यो मन इन्द्रियाणि च प्रत्याहृत्य परमात्मप्राप्तिमार्गेऽग्रेसारयति । साधकस्य परात्माकारां वृत्तिमुद्भाव्य संसारसागरात् पारं नयति ।
उक्तंहि गुरुगीतायाम्-
गुकारंतु गुणातीतं सकारं रूपवर्जितम् ।
गुणातीतमरूपश्च यो दद्यात्स गुरुः स्मृतः ॥
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि ।
दुर्लभा चिति विश्रान्ति: विना गुरुं कृपां पराम् ॥
यस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम् ।
स एव सर्वसंपत्ति: तस्मात्संपूज्यते गुरुम् ॥
.
सद्गुरु शिष्य के अन्तःकरण को काम-क्रोधादि दोषों को निकालकर वैराग्यादि साधनों से संपन्न कर देते हैं, ज्ञान रूपी दर्पण में आत्मसाक्षात्कार रूपी मुख दिखला देते हैं, अर्थात् जीव ब्रह्म की एकता करा के ब्रह्म का साक्षात्कार करा देते हैं । 
.
गुरु के द्वारा शिष्य का धोया हुआ अन्तःकरण फिर अज्ञान से आवृत्त नहीं होता । सद्गुरु मन और इन्द्रियों को विषय से मोड़ कर परमात्मा की तरफ अग्रसर कर देते हैं । साधक के अन्तःकरण में परमात्मकारा वृति पैदा करके संसार से मुक्ति करा देते हैं । 
.
गुरुगीता में कहा है कि- गुरु शब्द में जो ‘गु’ अक्षर है, वह गुणातीत का बोधक है और ‘र’ अक्षर रूपरहित स्थिति का बोधक है । अतः जो गुणातीत, रूपातीत, स्थितियों को देता है वह ही गुरु कहलाता है । ज्यादा कहने की क्या बात है, आप इतनी ही समझ लो कि गुरु की कृपा के बिना करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रान्ति नहीं होती ।
.
जिसके स्मरण मात्र से ज्ञान स्वयं प्रकट होने लगता है और वे ही सर्व संपदा(शमदमादि रूप) हैं । अतः श्रीगुरु की पूजा करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें