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*हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्वास ।*
*दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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॥ अपने पूजक की लाज भगवान् रखते हैं ॥
अपने पूजक की प्रभू, रख लेते हैं लाज ।
देवहित केश श्वेत किये, लाख लज्जित नरराज ॥१३७॥
दृष्टांत कथा – उदयपुर के पास के श्री चतुर्भुज स्वामी के मन्दिर के पुजारी वृद्ध ब्राह्मण देवाजी थे । एक दिन रात्रि के शयन के समय वे भगवान् की पुष्पमाला अपने शिर पर लपेट कर भगवान को शयन कराने के विचार में थे कि महाराणा आगये ।
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देवाजी ने शीघ्र शिर की माला उतार करके राणाजी को पहना दी । माला में राणा को एक श्वेत केश दीख पड़ा । राणा ने देवाजी से कहा – 'क्या भगवान् के केश भी श्वेत होगये' देवाजी हां, जी होगये ।' 'राणा – तो प्रभात मैं भी देखूंगा ।' यह कह कर राणा चले गये । देवाजी ने रात्रि भर भगवान् से प्रार्थना की कि 'मेरी लाज रखना ।' उनकी प्रार्थना स्वीकृत होगई ।
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प्रभात राणा ने आकर देखा तो भगवान् के केश अवश्य श्वेत है । कहीं देवा ने नकली लगा दिये होंगे यह सोच कर परीक्षा के निमित्त एक केश खेंचा तो मूर्ति का नाक चढ़ गया और केश के टूटते ही उसके स्थान से रक्त की धार निकली जो राणा के वस्त्रों पर जाकर पड़ी । यह देखकर राणा मूर्छित सा होगया और होश आने पर देवाजी से क्षमा माँगी । इससे सूचित होता है कि पूजक की लाज हरि रखते हैं ।

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