गुरुवार, 16 सितंबर 2021

*राघव समर्थ राम धन्य*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार ।*
*साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सुरसुरीजी*
*मूल छप्पय -*
*नारि सुरसुरानन्द की, प्रभु राखी प्रहलाद ज्यूं ।*
*ध्यान करत धर्महीन, असुर जब भये सकामी ।*
*सिंह रूप को धारि, उद्यत भये अन्तर्यामी ॥*
*धरि धर पटके दुष्ट, नष्ट दाँतन उर फारे ।*
*कछु जीवत गये भाज, महापापी संहारे ॥*
*राघव समर्थ राम धन्य,*
*भक्त बछल ब्रिद कहत यूं ।*
*नारि सुरसुरानन्द की,*
*प्रभु राखी प्रहलाद ज्यूं ॥१७२॥*
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स्वामी रामानन्दजी के शिष्य सुरसुरानन्द जी की धर्मपत्नी महान् पतिव्रता थीं । उनके पतिव्रत धर्म की और उनकी रक्षा भगवान् ने जैसे प्रहलाद की रक्षा नृसिंह होकर करी थी वैसे ही सिंह होकर इनकी की थी ।
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सुरसुरानन्द जी और सुरसरीजी रक्षा अपने घर की सब सम्पत्ति दान करके तथा घर छोड़कर, भगवद् भजन करने के लिये वृन्दावन में आ गये थे । एक दिन सुरसुरीजी एकान्त में बैठी भगवान् का ध्यान कर रही थीं । वहां धर्महीन मुसलमान या निकले । सुरसुरीजी का रूप सुन्दर था । इन को देखकर इनको हरने के लिये इन पर आक्रमण किया ।
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तब सुरसुरीजी ने प्रभु को पुकारा, उसी क्षण अन्तर्यामी परमात्मा सिंह रूप धारण करके रक्षा के लिये तैयार हो गये और दुष्टों को पकड़ पकड़ पृथ्वी पर पटक कर अपने दातों से उनके हृदय विदीर्ण करके उन्हें नष्ट कर डाला ।
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कुछ जीवित भाग गये, शेष सब महापापियों को मार गिराया । रामजी सर्व समर्थ और भक्त वत्सल हैं । इसी प्रकार उनका विरुद कहा जाता है । अतः रामजी धन्य हैं ।
(क्रमशः)

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