बुधवार, 15 सितंबर 2021

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*ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौंन ।*
*ऐसैं आत्मराम सौं, मन हठ साधै कौंन ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ सच्चे पूजक की रोटी भगवान् नित्य खाते हैं ॥*
सच्चे पूजक की प्रभू, रोटी प्रतिदिन खाय ।
धन्ना की खाते रहे, हरि मन में हर्षाय ॥१३६॥
दृष्टांत कथा – एक जाट के लड़के का नाम था धन्ना । एक बार उनके घर एक ब्राह्मण आया था । उसे पूजा करते देख कर बालक धन्ना ने भी पूजा करने के लिये उससे मूर्ति माँगी । प्रथम तो ब्राह्मण नट गया किन्तु अन्त में बाल हट देख कर एक काला पत्थर दे दिया ।
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वह गो चराने जाता था । जंगल में तालाब पर जाकर उसने पूजा आरम्भ की । पूजा समाप्त होते ही उसकी माता रोटियां लेकर आई । बालक ने रोटियां भगवान् के आगे रखदी । जब बहुत विनय करने पर भी भगवान् ने रोटी नहीं खाई तब धन्ना ने भी नहीं खाकर रोटियां तालाब में डालदी । इसी प्रकार कई दिन बीत गये । भूख से धन्ना बहुत कमजोर होगया ।
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अन्त में भगवान् प्रसन्न हुये और प्रगट होकर उसकी रोटी खाने लगे । जब आधा भोजन खा चुके तब धन्ना ने कहा –'क्या सब तुमही खाजाओगे कुछ मुझे भी तो दो ।' भगवान् हँसे और बची रोटी धन्ना को दे दी । अब प्रति दिन की ऐसी ही व्यवस्था होगई । इससे सूचित होता है कि सच्चे पूजक की रोटी भगवान् प्रति दिन खाते हैं ।

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