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*आंधी के आनन्द हुआ, नैंनहुँ सूझन लाग ।*
*दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पाँय परै विनती हु करै तज,*
*भूख मरै अड़ि के जु पुवायो ।*
*रोटिन ल्यावत नित्य जिमावत,*
*जो रहि पावत यूं मन लायो ॥*
*कोउ खुवावत वाहि रिझावत,*
*गाय चरावत यूं प्रभु भायो ।*
*आय फिरौं द्विज देखत नैं कुछ,*
*बात कही सब राम दिखायो ॥१६५॥*
धना भगवान् के चरणों में पड़ता था, बहुत विनय करता था किन्तु भगवान् नहीं जीमते थे । इससे आप भी रोटी नहीं खाता था, रोटियों को त्याग देता था, भूखों मरता था । इस प्रकार कई दिन हो गये, नहीं खाने पीने से बालक कमजोर हो गया । उसके नेत्रों से अश्रुधारा बहती रहती थी । किन्तु वह इस बात पर अड़ा हुआ था कि भगवान् नहीं खायेंगे तब तक मैं भी नहीं खाऊंगा ।
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तब एक दिन भगवान् प्रकट होकर उसकी रोटी खाने लगे । आधी रोटी जीमने पर धना ने प्रार्थना की मैं भी भूखा हूँ, मेरे लिये भी छोड़ना । भगवान् ने शेष रोटी छोड़ दी । उक्त प्रकार धना ने अड़कर(हठ करके) भगवान् को जिमाया था । अब प्रतिदिन रोटियां लाता था और नित्य प्रार्थना करके भगवान् को जिमाता था, भगवान् के जीमने पर जो शेष रह जाती थी वह आप जीम लेता था । इस प्रकार धना ने प्रभु में अपना मन लगाया था ।
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एक दिन भगवान् ने धना को कहा - भाई ! जो कोई भी जिसको खिलाता है तो खाने वाला उसका काम करके उसे प्रसन्न करता है । हम तेरी रोटियां खाते हैं, अतः तेरी गायें चरा लाया करेंगे । ऐसा कहकर हरि गायें चराने लगे । प्रतिदिन गायें चरा लाते थे । इस प्रकार वह प्रभु को प्रिय हो गया था । जिसने धना को गोल पत्थर दिया था, वह ब्राह्मण पुनः एक दिन धना के घर आया ।
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धना को पत्थर पूजा आदि करते नहीं देख कर पूछा । पूजा करता है ? धना ने कहा - पहले तो भगवान् ने बड़ा दुःख दिया । भोजन करते ही नहीं थे । अब तो प्रसन्न हैं, सदा मेरे साथ हो रहा करते हैं तथा गायें भी चरा लाते हैं । ऐसा कहते हुए अपनी उक्त घटना सब सुना दी । ब्राह्मण ने पूछा अब कहां हैं ? धना - गायें चराने गये हैं । ब्राह्मण - मुझे भी दिखाओ । ब्राह्मण को धना जहां गायें थीं ले गया किन्तु गायें चराते हुए भगवान् ब्राह्मण को नहीं दीखते थे । तब धना ने भगवान् से प्रार्थना की । भगवान् ने कहा - ब्राह्मण की गोद में बैठ जाओ तो इनको मेरा दर्शन हो जायेगा, नहीं तो नहीं होगा । धना ब्राह्मण की गोद में बैठ गया तब ब्राह्मण को भगवान् का दर्शन हो गया । इस प्रकार बालक धना ने अपने मार्ग प्रदर्शक को राम का दर्शन कराया ।
(क्रमशः)

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