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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १८९/१९२*
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कलि मंहि नहिं मानै कोई, अद्भुत मंड़ी१२ अगाध ।
कहि जगजीवन रांमजी, कहि कहि थाके साध ॥१८९॥
{१२. मंड़ी=बाजार(व्यापार स्थल)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ राम नाम के व्यापार को नहीं समझता यह बड़ा अद्भुत है इसे कितने ही साधु जन ने कहा है । जो भी इस पूंजी को अपनाता है वह सुखी ही रहता है ।
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जे जस पख मंहि बिराजै, ते तहां को अधिकार ।
कहि जगजीवन सांच कहि, निरपख ते जन सार ॥१९०॥
संत जी कहते हैं कि जो जिस पंथ में रहता है उसे उसी पंथ के नियमों के अनुसार रहना होता है । संत कहते हैं सत्य तो यह है कि निर्पख रहना ही सार है ।
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ले आवै इक अगम की, जहां न निगम प्रवेस ।
जगजीवन तौ जांणिए, सहि गया१३ वो ही देस ॥१९१॥
(१३. सहि गया=अनुकूल हो गया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो परमात्मा की ही चर्चा करें जहां इसके विपरीत कुछ भी न हो जो समझना चाहिये कि जीव सही स्थान पर पंहुचा है ।
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चहिन* फैन पाषंड़ में, षाई मेरा बाछ ।
जगजीवन कोई जौहरी, निरखै मन का राछ* ॥१९२॥
(*=*. मेरा अन्तर्मन दिन रात सकाम भावना से प्रभु की पाखण्डयुक्त भक्ति करता है, मन की इस वृत्ति को कोई जौहरी रूपी सद्गुरु ही समझ सकता है ॥१९२॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव यदि स्वयं की इच्छा पूर्ति के लिये ही भक्ति करता है तो वह भक्ति नहीं पाखण्ड है क्योंकि वह तो स्वयं की इच्छा पूर्ति चाहता है । ऐसे जीवों की पात्रता को सद्गुरु ही समझ कर सही मार्गदर्शन दे सकते हैं ।
(क्रमशः)

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