🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू अनवांछित टूका खात हैं, मर्महि लागा मन ।*
*नाम निरंजन लेत हैं, यों निर्मल साधु जन ॥*
==============
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
.
रज्जब सुकृत सेवा चोर ठग, पापी तिरहिं अपार ।
ज्यों बूड्यों बूड़े नहीं, नाव काठ के भार ॥१७॥
पुण्य कर्म और भक्ति के बल से अपार चोर, ठग और पापी तिर गये हैं, जैसे नाव काष्ठ के भार से डूबने पर भी नहीं डूबती, वेसे ही पुण्य और भक्ति से उक्त चोरादि डूबे हुये होने पर भी तिर जाते हैं ।
.
रज्जब पाप पषाण सम, पुण्य काष्ठ की नाव ।
जम जल तिरिये बैठि कहि१, तिहि२ प्राणी चढि जाव ॥१८॥
पाप पाषाण के समान है और पुण्य काष्ठ की नौका के समान है । जैसे पत्थर काष्ठ की नौका पर बैठ कर१ जल में तिर जाता है । वैसे ही जिसे जगत में तिरना हो वह प्राणी उस२ पुण्य की नौका पर चढ जाय अर्थात पुण्य करे ।
.
करहि जीव कृत१ पेट को, लावहिं पर उपकार ।
सो रज्जब सीझै२ सही३, ता में फेर न सार ॥१९॥
जीव पेट भरने के लिये काम१ करता है किंतु पेट भरने से बचे धन को परोपकार में लगा देता है, वह निश्चय ही सिद्धावस्था२ रूप मुक्ति को३ प्राप्त होता है । इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है । यह सार रूप बात है ।
.
मात पिता मैले मिले, सुत निपजा बिच साध ।
कुकृत में कीर्ति भई, रज्जब खेल अगाध ॥२०॥
माता पिता पापी होते हैं और उनके निष्पाप संत पुत्र उत्पन्न हो जाता है । वैसे ही पाप से पुण्य उत्पन्न होकर जगत में सुकीर्ति हुई अर्थात यज्ञ में किंचित पाप होता है किंतु पुण्य अधिकर होकर यज्ञ कर्ता का सुयश फैल जाता है, इसका थाह साधारण मनुष्य नहीं पा सकता ।
.
इन्द्र अवनि१ अपराध२ बिन, पिंड पड़ै ह्वै पाप ।
परि३ उनकी विषय सु४ बंदगी५, जग जीवन जड़६ जाप ॥२१॥
अति वृष्टि रूप इन्द्र के दोष२ बिना और भू चाल रूप पृथ्वी१ के दोष बिना ही अन्य निमित से जो शरीर गिरते हैं, यह निमित उन्हीं के पाप से बनते हैं । अत: वह पाप है । परन्तु३ उन मूर्ख६ जीवों को श्रेष्ठ विषय सुख४ की प्राप्ति होती है, वह उनका पुण्य ही है और संत सेवा५ तथा जगजीवन प्रभु के नाम का जप करना यह महापुण्य है ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१ समाप्तः ॥सा. ५०५५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें