शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

*मनोयोग*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सारा गहिला ह्वै रहै, अन्तरयामी जाणि ।*
*तो छूटै संसार तैं, रस पीवै सारंगपाणि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"एक मार्ग और है, मनोयोग; इस तरह के योगी में बाहर से कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते । उसका योग अन्तर से होता है । जैसे जड़भरत तथा शुकदेव । और भी बहुत से हैं, पर ये दो प्रसिद्ध हैं । इनकी दाढ़ी और बाल तैसे ही रहते हैं, वे उन्हें नहीं निकालते ।
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"परमहंस अवस्था में कर्म उठ जाते हैं । तब स्मरण-मनन ही रहता है । सदा ही मन का योग रहता है । अगर वह कर्म भी करता है तो लोक-शिक्षा के लिए ।
"चाहे कर्म के द्वारा योग हो या मन के द्वारा, भक्ति के होने पर सब समझ में आ जाता है ।
"भक्ति से कुम्भक आप ही हो जाता है । मन में एकाग्रता होने पर ही वायु स्थिर हो जाती है, और वायु के स्थिर होने पर ही मन एकाग्र होता है, बुद्धि स्थिर हो जाती है ।
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जिसे होता है, वह खुद नहीं समझ सकता ।
“भक्तियोग में योग के साधन होते हैं । मैंने माँ से रो-रोकर कहा था - 'माँ, योगियों ने योग करके, ज्ञानियों ने विचार करके जो कुछ समझा है, वह सब तू मुझे समझा दे - मुझे दिखला दे ।' माँ ने मुझे सब कुछ दिखा दिया है । व्याकुल होकर, उनके निकट रोने पर सब कुछ बतला देती हैं । वेद, वेदान्त, पुराण, इन सब शास्त्रों में क्या है, सब उन्होंने मुझे समझा दिया है ।"
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मणि - हठयोग ?
श्रीरामकृष्ण - हठयोगी देहाभिमानी साधु हैं । वे बस नेति-धौति करते हैं - केवल देह की चिन्ता ! उनका उद्देश्य आयु की वृद्धि करना है । देह की ही दिन रात सेवा किया करते हैं । यह अच्छा नहीं ।
"तुम्हारा कर्तव्य क्या है ? - तुम लोग मन ही मन कामिनी और कांचन का त्याग करो । तुम लोग संसार को काकविष्ठा नहीं कह सकते ।
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"गोस्वामी गृहस्थ हैं; इसीलिए मैं उनसे कहता हूँ, तुम्हारे यहाँ श्रीठाकुरजी की सेवा है, तुम लोग क्या संसार का त्याग करोगे - तुम लोग संसार को माया कहकर उनका अस्तित्व लोप नहीं कर सकते ।
"संसारियों का जो कर्तव्य है, उस पर श्रीचैतन्यदेव ने कहा है - 'जीवों पर दया रखो, वैष्णवों की सेवा करो, उनका नाम लो ।'
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"केशव सेन ने कहा था - 'वे इस समय, दोनों ही करो, कह रहे हैं । एक दिन कहीं चुपचाप काट खायेंगे ।’ परन्तु बात ऐसी नहीं - भला मैं क्यों काटूंगा ?"
मणि मल्लिक - किन्तु आप तो काटते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) – क्यों ? तुम जैसे के वैसे ही तो बने हो - तुम्हें त्याग करने की क्या जरूरत है ?
(क्रमशः)

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