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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १२९/१३२*
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दीपक सूरज चंद्रमा, तारा तेज अनंत ।
कहि जगजीवन आरती, सकल उतारै संत ॥१२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दीपक जहाँ सूर्य चंद्रमा व तारे हैं वहां सभी संत उन ब्रह्म की आरती उतारते हैं ।
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नहिं सूरज नहिं चंद्रमा, नहिं तारा नहिं तेज ।
कहि जगजीवन तहां जन, रमैं निरंजन सेज४ ॥१३०॥
(४. सेज=शय्या)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ न तो सूर्य चंद्र है न ही तारागण न प्रकाश है वहां ही कृपापात्र जीवात्मा परमात्मा के सानिध्य में प्रेम पूर्वक रहता है ।
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मिनख देह५ संजोग धरि, परसै अलख अगाध ।
कहि जगजीवन जो मिलै, रांम सरीखा साध ॥१३१॥
(५. मिनख देह=मनुष्य शरीर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मनुष्य देह बड़े संयोग से मिलती है । जो प्रभु सानिध्य के लिये है । वह तब ही मिल सकते हैं जब प्रभु अनुरूप कोइ साधु जन मार्ग दर्शक हो ।
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कहि जगजीवन साध सब, उनमनिक६ राते रांम ।
तहँ ते कहिये हरि भगति, जहां प्रकासै नांम ॥१३२॥
(६. उनमनि=चित्त की एकाग्र अवस्था) संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी सत चित की एकाग्रता में रत रहने को कहते हैं । जहाँ सिमरण है वहां ही प्रभु की भक्ति है ।
(क्रमशः)

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