शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९७

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९७)*
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*९७. परिचय । त्रिताल*
*जग सौं कहा हमारा, जब देख्या नूर तुम्हारा ॥टेक॥*
*परम तेज घर मेरा, सुख सागर माहिं बसेरा ॥१॥*
*झिलमिल अति आनन्दा, तहँ पाया परमानन्दा ॥२॥*
*ज्योति अपार अनन्ता, खेलें फाग बसन्ता ॥३॥*
*आदि अंत अस्थाना, जन दादू सो पहचाना ॥४॥*
*॥ राग कल्याण समाप्त ॥३॥पद २॥*
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भा० दी०-परब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं स्वत एव जगदासक्तिर्विदुषो निवर्तते । अतो ज्ञानिनो जगता किमपि प्रयोजनं नास्ति । तेषां निरपेक्षत्वात् । ते तु तेजोमये ब्रह्मणि स्वस्वरूपाकारे सुख- सागरे सततं रमन्ते । तत्र व्यापकस्य ज्योतिस्वरूपस्य परमात्मन आनन्दोऽहर्निशं तेषां जायते । तदिद- मात्मज्योतिरनन्तं न तस्य कोऽपि पारममधिगन्तुं शक्नोति । तत्रस्था भक्ता वसन्त-क्दानन्दोत्सवमुन्सीलयन्ति (कुर्वन्ति) अहन्तु सृष्टेः प्राक्यदेव सद्ब्रह्मास्ति चान्ते यः शिष्यते तस्मिन्ने-व कृतनित्यनिकेतनोऽस्मि । तदेव सर्वेषामाश्रयः । इति भावः ॥
उक्तहि-अष्टावक्रगीतायाम्
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ।
संसाराऽऽसक्तिस्तु बन्धनकारी भवति ।
उक्तंहि-
स्नेहेन धनलोभेन लाभेन मणियोषिताम् ।
आपातरमणीयेन चेतो गच्छति पीनताम्॥
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परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार के बाद ज्ञानी की जगत् से आसक्ति निवृत्त हो जाती है । इससे ज्ञानी को जगत् से कुछ लेना-देना नहीं होता क्योंकि वह निरपेक्ष हो जाता है । किन्तु वह तो तेजोमय ब्रह्म के स्वरूप में जो सुख का सागर है उसमें सदा निवास करता रहता है ।
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यह आत्मज्योति अनन्त है । उसका पार कोई नहीं जान पाता है । वहां पर रहने वाले भक्त भगवान् के साथ वसन्त की तरह आनन्दोत्सव मनाते रहते हैं । मैं तो सृष्टि के आदि, अन्त, मध्य में जो एक रस रहता है, उसी में अपना घर बना रहता हूं, अर्थात् उसके स्वरूप को जान लिया है ।
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अष्टावक्र गीता है –
जब मन न चाहता है न सोचता है, न त्यागता है, न ग्रहण करता है, न प्रसन्न होता है और न दुःखी होता है, तब जीव मुक्त हो जाता है ।
संसार की आसक्ति तो बंधन को पैदा करती है । लिखा है कि –
स्त्री, पुत्र, आदि में स्नेह कर के धन के लोभ से तथा मणियोषित आदि की प्राप्ति से चित्त दीनता को प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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