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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि ।*
*डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
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प्रवृत्ति धोरा रेत१ का, निवृत्त है गचगीर२ ।
मन जल किंहि मग३ मेलिये, ब्रह्म विडै४ जाय वीर ॥९॥
प्रवृत्ति मिट्टी१ की नाली के समान है और निवृत्ति पक्कीनाली२ के समान है । जैसे जल को मिट्टी की नाली में चलाओ वा पक्की नाली में चलाओं दोनों मे से किसी भी मार्ग३ से चलाओ वह तो वृक्ष की जड़४ में ही जायगा किंतु कच्ची से देर में और पक्की से शीघ्र जायगा इतना ही अंतर है, वैसे ही मन को पुण्य कर्म रूप प्रवृत्ति से ले जाओ वा भजन विचार रूप निवृत्ति से ले जाओ वह तो ब्रह्म में ही जायगा किंतु प्रवृत्ति से देर में और निवृत्ति से शीघ्र जायगा, इतना ही अंतर है ।
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निवृत्ति प्रवृत्ति द्वै कथा, वो१ ओंकार सु शब्द ।
निर्गुणी निर्गुण आदरी, सह गुण करि सु रद्द२ ॥१०॥
निवृत्ति संबंधी तथा प्रवृत्ति संबंधी दो प्रकार की कथायें हैं । एक तो ओंकार अर्थात निर्गुण ब्रह्म के नाम चिंतन संबंधी है और१ दूसरी अनेक शब्द मय सगुण संबंधी है । निर्गुणी साधकों ने निवृत्ति मय निर्गुण कथा का आदर किया गया है और प्रवृत्ति मय सगुण कथा को त्याग२ दिया है ।
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वटक१ बोल२ तो द्वै द्वै चाल, स्वारथ जड़ परमारथ डाल ।
इहि३ दिशि निरफल४ वहि५ फल फूल, नीचे ऊंचे एकै मूल ॥११॥
जैसे बड़१ का वृक्ष ऊंचे और नीचे दोनों ओर चलता है । ऊंचे डालें चलती हैं तो नीचे जड़ें चलती हैं । जड़ें फलरहित४ होती हैं और डालों के फल फूल लगते हैं किंतु दोनों का मूल एक ही है । वैसे ही वचन२ दो प्रकार से निकलते हैं एक तो स्वार्थ मय दूसरा परमार्थ मय । इस३ संसार की ओर के वचन स्वार्थमय होते हैं, अत: ज्ञान भक्ति रूप फल फूल से रहित होते हैं । उस५ प्रभु की ओर के वचन परमार्थ मय होते हैं, वे ज्ञान भक्ति रूप फल फूल से युक्त होते हैं किंतु दोनों प्रकार के वचनों का मूल एक ही हृदय है । स्वार्थ मय वचन प्रवृत्ति रूप है और परमार्थ मय वचन निवृत्ति रूप है ।
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सांच झूठ द्वै चरण हैं, जीव चलै इन१ मग्ग२ ।
इक टंग्यों३ की और है, जहां न दूजा पग्ग४ ॥१२॥
सत्य और मिथ्या ये दो चरण हैं, जीव इन दो१ से ही मार्ग२ चलते हैं । सत्य चरण की जिनमें प्रधानता होती है वे सन्मार्ग में और असत चरण की प्रधानता होती है वे असन्मार्ग मे चलते हैं किंतु जिनके प्रवृत्ति रूप दूसरा चरण४ नहीं होता उन अद्वैत स्थिति रूप एक चरण३ वालों की गति और ही प्रकार की होती है अर्थात वे तो ब्रह्म में ही लय होते हैं । अत: प्रवृत्ति का फल संसार है और निवृत्ति का फल ब्रह्म प्राप्ति है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६० समाप्तः ॥सा. ५०३४॥
(क्रमशः)

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