शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

*(४)मातृभाव से साधना*

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*बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार ।*
*परमेश्‍वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(४)मातृभाव से साधना*

कमरे में छोटे तख्त पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं । नरेन्द्र, भवनाथ, बाबूराम, मास्टर जमीन पर बैठे हुए हैं । घोषपाड़ा और पंचनामी मतों की बात नरेन्द्र ने चलायी । श्रीरामकृष्ण उनका वर्णन कर रहे हैं -
"ये लोग ठीक ठीक साधना नहीं कर सकते । धर्म का नाम लेकर इन्द्रियों को चरितार्थ किया करते हैं ।
(नरेन्द्र से) "तुझे अब इन मतों के सम्बन्ध में कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है ।
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"ये जो भैरव-भैरवियाँ हैं, ये सब ऐसे ही हैं । जब मैं काशी गया था, तब एक दिन मुझे भैरवी-चक्र ले गये थे । उनमें एक एक भैरव था और एक एक भैरवी । मुझे कारण-पान करने के लिए कहा । मैंने कहा, माँ, मैं तो कारण छू भी नहीं सकता । तब वे लोग खुद पीने लगे । मैंने सोचा अब शायद ये लोग जपध्यान करेंगे; परन्तु वह तो रहा अलग, वे लोग नाचने लगे । मुझे भय होने लगा कि कहीं गंगाजी में न गिर जायँ । चक्र गंगा के तट पर ही था ।
"पति और पत्नी अगर भैरव-भैरवी हो जायँ तो उनका बड़ा सम्मान होता है ।
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(नरेन्द्र आदि भक्तों से) “मेरा मातृभाव है, सन्तान-भाव । मातृभाव बड़ा शुद्ध भाव है । इसमें कोई विपत्ति नहीं है । भगिनी भाव भी बुरा नहीं स्त्रीभाव या वीरभाव बड़ा कठिन है । तारक का बाप इसी भाव की साधना करता था । बड़ा कठिन है, भाव ठीक नहीं रहता ।
"ईश्वर के पास पहुँचने के अनेक मार्ग हैं । सभी मत एक एक मार्ग हैं जैसे काली-मन्दिर जाने की बहुत सी राहें हैं । इनमें भेद इतना ही है कि कोई राह शुद्ध है और कोई राह अशुद्ध; शुद्ध रास्ते से होकर जाना ही अच्छा है ।
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“मैंने बहुत से मत देखे, बहुत से पथ देखे । यह सब अब और अच्छा नहीं लगता । सब एक दूसरे से विवाद किया करते हैं । यहाँ और कोई नहीं है, तुम सब अपने आदमी हो, तुम लोगों से कह रहा हूँ, अब मैंने यही समझा कि वे पूर्ण हैं और मैं उनका अंश हूँ, वे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ । कभी यह भी सोचता हूँ कि 'वही' 'मैं' है और 'मैं' ही ‘वह’ हूँ ।"
(भक्तमण्डली स्तब्ध हो सुन रही है ।)
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भवनाथ - (विनयपूर्वक) - लोगों से मतान्तर होने पर मन न जाने कैसा करने लगता है । इससे यह याद आता है कि सब को मैं प्यार न कर सका ।
श्रीरामकृष्ण – पहले एक बार बातचीत करने की, उनसे प्रीतिपूर्वक बर्ताव करने की चेष्टा करना । चेष्टा करने पर भी अगर न हो, तो फिर इसकी चिन्ता न करनी चाहिए । उनकी शरण में जाओ - उनकी चिन्ता करो । उन्हें छोड़कर दूसरे आदमियों के लिए मन में दुःख लाने की क्या जरूरत है ?
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भवनाथ - ईसा मसीह और चैतन्य, इन लोगों का कहना है कि सब को प्यार करना चाहिए ।
श्रीरामकृष्ण - प्यार तो करना ही चाहिए, क्योंकि सब में परमात्मा का ही वास है, परन्तु जहाँ दुष्टात्मा हों वहाँ दूर से नमस्कार करना ही ठीक है । और चैतन्यदेव ? उनके लिए भी एक गाने में है - 'विजातीय लोगों को देखकर प्रभु भाव संवरण करते हैं ।' श्रीवास के यहाँ से उनकी सास को बाल पकड़कर निकाल दिया था ।
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भवनाथ - परन्तु किसी दूसरे ने निकाला था ।
श्रीरामकृष्ण - बिना उनकी सम्मति के क्या वह कभी ऐसा कर सकता था ?
"किया क्या जाय ! अगर दूसरे का मन न मिला, तो क्या रातदिन बैठे हुए इसीकी चिन्ता की जाय ? जो मन उन्हें देना चाहिए, उसे इधर-उधर लगाये रखकर उसका व्यर्थ खर्च किया करूँ ? मैं कहता हूँ, 'माँ, मैं नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, किसी को नहीं चाहता, मैं तुम्हें चाहता हूँ । आदमी को लेकर मैं क्या करूँ ?
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"उन्हें पा लेने पर सब को पा जाऊँगा । रुपया मिट्टी है और मिट्टी ही रुपया, सोना मिट्टी है और मिट्टी ही सोना, यह कहकर मैंने त्याग किया था - गंगाजी में फेंक दिया था । पीछे से डरा कि लक्ष्मीजी को कहीं क्रोध न आ जाय । लक्ष्मी के ऐश्वर्य की मैंने अवज्ञा की, यदि वे मेरी खुराक बन्द कर दें तो ? तब कहा, माँ, बस तुम्हें चाहता हूँ और कुछ नहीं । उन्हें पाया तो सब कुछ पा गया ।"
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भवनाथ - (हँसते हुए) - यह तो चालबाजी है ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, उतनी चालबाजी है ।
"श्रीठाकुरजी ने किसी को दर्शन देकर कहा, तुम्हारी तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ । तुम अब कोई वरदान माँगो । साधक ने कहा, 'भगवन्, अगर वरदान दीजियेगा तो यह वर दीजिये - मैं सोने की थाली में अपने पोते के साथ भोजन करूँ ।’ इस तरह एक वर में बहुत से वर मिल गये । धन हुआ, लडका हुआ और पोता हुआ ।" (सब हँसे ।)
(क्रमशः)

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