शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १५३/१५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १५३/१५६*
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कहि जगजीवन हरि भगत१, हरि ब्रत राखै मांहि । 
रांम नांम भावै भगति, दूजा भावै नांहि ॥१५३॥
(१. हरि भगत=भगवान् के भक्त को एकमात्र भक्ति ही अच्छी लगती है) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के भक्त जन का एक ही प्रण प्रभु भक्ति ही होता है । उन्हें राम नाम की भक्ति ही अच्छी लगती है और अन्य कुछ अच्छा नहीं लगता है । 
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कहि जगजीवन सब भले, सेवग२ स्वामी३ साध४ । 
एक आध अबिगति सुमरि, परसै अलख अगाध ॥१५४॥
(२. सेवग=भगवान् का भक्त)   (३. स्वामी, प्रभु)   (४. साध=सन्त जन) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के सेवक, स्वामी स्वयं प्रभु व संत सभी अच्छे हैं । संत व दास तो प्रभु को सिमरते हैं तब अच्छे हैं व प्रभु उनकी पुकार स्वीकार कर उनसे आ मिलते हैं, अतः वे अच्छे हैं । 
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कछु* न कहावै आपको, साहिब का बंदा । 
कहि जगजीवन नांम मैं, आतम आनंदा* ॥१५५॥
(*=*. कछु न कहावै=तुल० श्री दादू वाणी= 
कछु न कहावै आपकों, सांई कों सेवै । 
दादू दूजा छाडि सब, नांउं निज लेवै ॥(२/३०)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का सच्चा भक्त वह है जिसका अपना कोइ परिचय ही नहीं है, और स्मरण ही जिनके आनंद है । 
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जे* हम हूँहीं तो हम कहैं, है सो अगम अगाध । 
कही जगजीवन रांम रत, ता थैं कहिये साध* ॥१५६॥
{*=*. हमारी कोई सत्ता हो तो हम अपने लिये कुछ(नांम) कह सकते हैं । वास्तविक सत्ता तो उस परम पिता परमात्मा की है । अतः हम अपने को केवल 'साध'(साधक=परमात्मा के आराधक) ही कहते हैं ॥१५६॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अगर हम कुछ हो तो हमारा परिचय हो जो कुछ है हमारा वे तो स्वयं प्रभु ही हैं हम कुछ हैं ही नहीं हम तो बस उनके नाम में ही मग्न हैं । संत कहते हैं कि नाम साधना से ही साधक या साधु जन कहलाते हैं । 
(क्रमशः)

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