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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०३)*
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*१०३. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल*
*मन मतिहीण धरै,*
*मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥टेक॥*
*नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै ।*
*सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥१॥*
*नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै ।*
*दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥२॥*
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भा० दी०-हे मूढ साधक ! श्रृणु, जनोऽयं किमपि न बुध्यते । विषयलुब्धो वैषयिक-चिन्ताज्वालायां व्यर्थमेव ज्वलति । भगवन्तं विस्मृत्य विपरीतभावनया स्वयमेव क्लेशमनुभवति दुर्वासनानुसारेण कुत्सितं कर्म विदधाति । न च मनसा कदापि भगवन्नाम जपति । अतो जीवोऽयं वारं वारं जायते प्रियते च । हे जीव ! किमर्थं त्वं यमभयाद् भीतोऽसि, भगवन्तं स्मर । भगवन्नाममात्रात् तु यमोऽपि बिभेति । अतो भयं विहाय तन्नाम-कीर्तनं कुरु । रामस्मरणेन तु संसारबन्धनभयमपि निवर्तते । तरति च भवसिन्धुं जीव: । तीर्खा भगवद्पो भवति ।
श्रीमद्भागवते-
अयं हि कृतनिवेशो जन्मकोट्वंहसामपि
यद् व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरेः ।
एतेनैवाघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम् ।
यदा नारायणेति जगाद चतुरक्षरम् ।
सर्वेषामप्यघवतामिदमेव सुनिष्कृतम्॥
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्त्वद्विषया मतिः ॥
नारायणकवचस्तोत्रे-
यन्नोभयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च ।
सरीस्पेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽहोभ्य एव वा ॥
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये न: श्रेय: प्रतीपकाः ॥
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हे मूर्ख साधक ! मेरी बात सुन । ये संसारी जन कुछ भी नहीं समझते । विषय लोलुप होकर व्यर्थ ही विषयाग्नि में जल रहे हैं । नीच भावना करके भगवान् को भूल जाते हैं और दुःख पाते हैं । नीच भावना के अनुसार नीच कर्म करते रहते हैं, कभी भी भगवान् को याद नहीं करते, इसलिये बार बार जन्मते मरते रहते हैं ।
हे प्राणी ! तूं क्यों यम से भयभीत हो रहा है ? भगवान् के नाम का स्मरण कर क्योंकि उनके नाम से तो यम भी डरता है । अतः भय को छोड़ कर भगवान् का नाम जप । राम-नाम के जप से तो संसार का भय भी भाग जाता है तथा साधक संसार को पार करके भगवद् रूप हो जाता है ।
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श्रीमद्भागवत में कहा है कि –
इस अजामि ने तो करोड़ों जन्मों के पापों का प्रायश्चित कर लिया क्योंकि इस समय इसने विवश होकर भगवान् का मंगलमय नाम उच्चारण किया है । ‘नारायण’ इन चारों अक्षरों के उच्चारण करने से इस पापी का प्रायश्चित हो गया है, क्योंकि समस्त पापों के नाश के लिये भगवन्नामोच्चारण ही सबसे अच्छा प्रायश्चित है, क्योंकि ऐसा करने से बुद्धि भगवदाकारा बन जाती है ।
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नारायण-कवच में लिखा है कि –
ग्रह, नक्षत्र, मनुष्य, सांप, हिंसक, जीव, अथवा पापों से जो हमें भय प्राप्त हो सकते हैं तथा श्रेय मार्ग के जो प्रतिबन्धक हैं, वे सब भगवन्नाम-कवच का कीर्तन करने से नष्ट हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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