सोमवार, 6 सितंबर 2021

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*दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।*
*सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ भगवत् पद सेवक की देवता भी सेवा करते हैं ॥*
पद सेवक की देव भी, करत सेव सह प्रेम ।
काष्ट नरहरियानन्द के, पताका शक्ति सनेम ॥१२३॥
दृष्टांत कथा – नरहरियानन्दजी सदा भगवत् चरण सेवा में ही लगे रहते थे । एक दिन भगवत् भोग के लिये रसोई बनाने लगे किन्तु सूखी लकड़ी नहीं मिली, तब वह सोच कर कि भगवान् के भोग तो समय पर अवश्य लगाना ही है ।
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अपने समीप के दुर्गा मन्दिर की छत लकड़ियों की थी । वे उस छत को उखाड़ने लगे । शक्ति(दुर्गाजी) उनकी भगवत् सेवा से प्रसन्न होकर बोली – 'छत को नहीं तोड़ो लकड़ियां आपके सदा आवश्यकतानुसार पहुँचती रहेंगी । वे लौट आये' दुर्गाजी प्रतिदिन आवश्यकतानुसार लकड़ियां उनके यहां पहुंचा देती थी ।
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उनके पड़ोसी की स्त्री को ज्ञात हुआ तब उसने भी अपने पति को कहा – तुम भी जाकर दुर्गा को डराओ, जिससे प्रति दिन बिना परिश्रम ही लकड़िया घर आजाया करेंगी ।' वह दुर्गा के मन्दिर में जाकर ज्योंही छत उखाड़ने लगा कि उसका शिर नीचे और पैर ऊपर होगये और वहां ही लटकने लगा । दुर्गा से प्रार्थना करी तब दुर्गा ने कहा – 'यदि तू मेरे बदले प्रति दिन नरहरियानन्दजी के लकडियां पहुंचा दिया करे तब तो तेरे प्राण बच सकते हैं, नहीं तो अभी प्राण लेती हूँ ।' उसने स्वीकार कर लिया और प्रति दिन पहुँचाने लगा । इससे सूचित होता है कि भगवत् पादसेवक की सेवा देवता भी करते हैं ।

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