मंगलवार, 7 सितंबर 2021

*राजा के रामजी दाबिगो पाई*

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*ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई ।*
*हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १७३)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मू. इ. - एक समय जन सेन के संत,*
*पधारि हुते उन प्रीति लगाई ।*
*मंजन बेर भई नृप टेरत,*
*आपन आय भये तहँ नाई ॥*
*सेन सुना समयो जब बीत गो,*
*राजा के रामजी दाबिगो पाई ।*
*राघो कहै अपने जन की,*
*महिमा हरि आपन आय बधाई ॥१६६॥*
एक समय सेन भक्त के घर संत पधारे थे । सेन ने उनकी सेवा में प्रीति पूर्वक वृत्ति लगाई थी ।
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उधर राजा के स्नानादि का समय हो गया था । देर होने से राजा ने आवाज दी - सेन नहीं आया क्या ? तब उसी क्षण स्वयं भगवान् वहां सेना नाई के रूप में प्रकट हो गये और राजा की सेवा की ।
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सेन भक्त ने सुना कि राजा के स्नानादि का समय व्यतीत हो गया है । इससे उसे कुछ चिन्ता हुई किन्तु उधर तो भगवान् सेन का रूप बनाकर राजा के पैर दबाना आदि सेवा कर गये थे ।
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उक्त प्रकार स्वयं हरि ने आकर अपने भक्त की महिमा बढ़ाई थी ।
(क्रमशः)

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