सोमवार, 6 सितंबर 2021

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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक प्रभु सेवा को सदा निवाहता है ॥*
पद सेवक प्रभु सेव का, करता सदा निवाह ।
कीन्हा कुंवरकिशोर ने, मिली इसी से वाह ॥१२२॥
दृष्टांत कथा – कुंवरकिशोर राजा खेमाल के पोते थे । देहत्याग के समय खेमाल के नेत्रों में जल भरा देख कर के पुत्रों ने कहा – 'आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ? यह राज्य धन आदि सब भगवान् के ही हैं चाहो सो दान – पूण्य कर सकते हो ।'
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खेमाल ने कहा – 'ये सब तो मैंने अपनी इच्छा के अनुसार कर लिये किन्तु दो बातों के लिये चिन्ता है । एक तो भगवत् सेवा के लिये अपने शिर पर जल का कलश लाकर सेवा नहीं की और दूसरे नूपर बांधकर भगवान् के सामने नृत्य नहीं किया ।' यह सुन करके पुत्र चुप ही रहे कुछ बोल नहीं सके ।
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कुँवरकिशोर ने हात जोड़ करके विनय करी - 'यह आज्ञा इस दास को दीजिये । मैं जीवन पर्यन्त इस आपकी आज्ञा को निबाहूँगा ।' राजा ने कुँवरकिशोर को छाती के लगा लिया और दोनों सेवाए; करने की आज्ञा देकर के परमधाम को प्रस्थान किया । कुंवरकिशोर ने वह आज्ञा प्राणान्त टक बिना व्यवधान निवाही । इसी से उन्हें वाह(धन्यवाद) प्राप्त हुई थी । इससे सूचित होता है कि पद सेवक सेवा में व्यवधान नहीं होने देता ।

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