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*दादू परचा माँगें लोग सब,*
*कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अल्हजी की पद्य टीका*
*जाय चले इक बाग निहारत,*
*अल्ह भई मन पूजन कीजे ।*
*आम रह्यो पक मालि हि याचत,*
*लेहु कहा तब डार नईजे ॥*
*जाय कही नृप से जु हुई जिमि,*
*प्रीति भई सुन पाँव गहीजे ।*
*आय परयो पग आज भलो दिन,*
*शीश दियो कर राम भजीजे ॥१६९॥*
अल्ह जी मार्ग से चले जा रहे थे, मार्ग में किसी राजा का बाग देखा, तब उनके मन में इच्छा हुई कि यहां ही भगवत् सेवा-पूजा कर लें ।
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पूजाकर के उन्होंने पका हुआ आम देखा तब भगवान् के भोग लगाने के लिये माली से मांगा । उसने कहा - भगवान् को खाना है तो वे ही क्यों नहीं ले लेते ? तुम क्यों माँगते हो ?
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तब पके हुए आमों की डाली नीचे झुककर ठाकुर जी के पास आ गई । अल्हजी ने लेकर भोग लगाया । यह बात जैसे हुई थी वैसे ही माली ने जाकर राजा को सुनाई । इससे राजा की प्रीति संत अल्ह में हुई । यह उक्त बात सुनकर सोचने लगा, ऐसे संत के चरण स्पर्श अवश्य करना चाहिये ।
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फिर राजा बाग में आया और अल्ह जी के चरणों में पड़कर बोला – आज का दिन बहुत ही अच्छा है, जो आप जैसे संतों का दर्शन हुआ है । अल्ह जी ने अपना वरद हस्त राजा के शिर पर रक्खा और कहा - रामजी का भजन किया करो, यही सार है ।
(क्रमशः)

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